नवरात्रोत्सव: भक्ति, इतिहास, पौराणिक कथाएँ और लोकसंस्कृति का भव्य उत्सव

भारत विभिन्न त्योहारों, उत्सवों, परंपराओं और संस्कृतियों से समृद्ध देश है। हमारे हर त्योहार के पीछे कोई न कोई धार्मिक, पौराणिक, ऐतिहासिक या सामाजिक महत्व जुड़ा हुआ है। इसी समृद्ध परंपरा का एक महत्वपूर्ण और पूरे देश में बड़े भक्तिभाव से मनाया जाने वाला उत्सव है — नवरात्रोत्सव।

‘नवरात्र’ का अर्थ है नौ रातों का उत्सव। इस दौरान देवी के विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है। कई जगह उपवास, घटस्थापना, आरती, भजन, गरबा, डांडिया, जागरण और विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

महाराष्ट्र में नवरात्र को धार्मिक परंपराओं के साथ लोकसंस्कृति की भी सुंदर पहचान मिली है। वहीं गुजरात में गरबा और डांडिया, पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा, कर्नाटक में मैसूर दशहरा और उत्तर भारत में रामलीला जैसे अलग-अलग रूपों में यह उत्सव मनाया जाता है।

इसलिए नवरात्र केवल देवी की उपासना का पर्व नहीं है, बल्कि यह भारत के अलग-अलग क्षेत्रों की श्रद्धा, परंपराओं और लोकसंस्कृति को एक साथ जोड़ने वाला उत्सव भी है।

नवरात्र के पीछे की पौराणिक कथा

नवरात्र के संदर्भ में सबसे प्रसिद्ध कथा देवी और महिषासुर के बीच हुए युद्ध की है।

देवीमहात्म्य और देवी की उपासना से जुड़ी पौराणिक परंपराओं के अनुसार, महिषासुर नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था। उसने कठोर तपस्या करके ब्रह्मदेव से वरदान प्राप्त किया था। इस वरदान के कारण देवताओं के लिए भी उसका पराजय करना कठिन हो गया था।

वरदान से शक्तिशाली होकर महिषासुर ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया। उसने स्वर्ग पर अधिकार कर लिया और देवताओं को उनके स्थानों से दूर कर दिया।

तब देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश सहित अन्य देवताओं से सहायता मांगी। महिषासुर के अत्याचार का अंत करने के लिए सभी देवताओं का तेज एकत्र हुआ और उस दिव्य शक्ति से आदिशक्ति देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ।

देवताओं ने देवी को अपने-अपने दिव्य अस्त्र प्रदान किए। भगवान शिव ने त्रिशूल, भगवान विष्णु ने चक्र, इंद्र ने वज्र और अन्य देवताओं ने भी विभिन्न दिव्य अस्त्र देवी को अर्पित किए। देवी सिंह पर आरूढ़ होकर महिषासुर की सेना से युद्ध करने लगीं।

यह युद्ध अत्यंत भयंकर था। महिषासुर ने अलग-अलग रूप धारण करके देवी से युद्ध किया। यह युद्ध नौ दिनों तक चला और अंत में देवी ने महिषासुर का वध किया।

महिषासुर का वध करती हुई आदिशक्ती माँ दुर्गा का दिव्य रूप
महिषासुरमर्दिनी माँ दुर्गा द्वारा अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक।

इसी विजय की स्मृति में नवरात्र और उसके बाद आने वाला विजयादशमी का दिन अधर्म पर धर्म और असुरी शक्ति पर दैवी शक्ति की विजय के रूप में देखा जाता है।

इसी कारण देवी को “महिषासुरमर्दिनी” भी कहा जाता है।

मैसूर दशहरे की परंपरा में भी देवी चामुंडेश्वरी और महिषासुर की कथा का विशेष संबंध है। मैसूर दशहरे की परंपरा देवी चामुंडेश्वरी की महिषासुर पर विजय से जुड़ी मानी जाती है।

श्रीराम और अकालबोधन की परंपरा

नवरात्र से जुड़ी एक और प्रसिद्ध परंपरा है — अकालबोधन।

विशेष रूप से बंगाल और पूर्वी भारत की परंपरा में यह कथा सुनाई जाती है कि रावण से युद्ध करने से पहले श्रीराम ने देवी दुर्गा की पूजा की थी।

यह पूजा पारंपरिक रूप से देवी के सामान्य पूजा काल के अलावा (एक अलग समय पर) की गई थी। इसीलिए इसे ‘अकाल बोधन’ नाम दिया गया.

इस परंपरा के अनुसार, श्रीराम ने देवी को 108 नीले कमल अर्पित करने का संकल्प लिया था।

पूजा के समय देवी ने श्रीराम की भक्ति और समर्पण की परीक्षा लेने के लिए एक कमल छिपा दिया, ऐसी प्रसिद्ध भक्तिपरंपरा है।

जब श्रीराम ने अंतिम कमल खोजा, तो वह उन्हें नहीं मिला। श्रीराम को “कमलनयन” भी कहा जाता है। इसलिए उन्होंने अपना एक नेत्र कमल के स्थान पर अर्पित करने का निश्चय किया।

श्रीराम की इस अखंड भक्ति को देखकर देवी प्रसन्न हुईं और उन्होंने श्रीराम को विजय का आशीर्वाद दिया।

प्रभु श्री राम अकालबोधन पूजा में माँ दुर्गा को नीले कमल अर्पित करते हुए
रावण से युद्ध से पूर्व प्रभु श्री राम द्वारा की गई माँ दुर्गा की अकालबोधन पूजा।

यह कथा विशेष रूप से बंगाली लोकपरंपरा और कृत्तिवासी रामायण की परंपरा से जुड़ी मानी जाती है। इसलिए आज की दुर्गापूजा की कुछ धार्मिक परंपराओं में इसका विशेष महत्व है।

नवरात्र की नौ देवियाँ — नवदुर्गा

नवरात्र के नौ दिनों में देवी के नौ रूपों की पूजा करने की परंपरा है। इन नौ रूपों को नवदुर्गा कहा जाता है।

1. शैलपुत्री

पहले दिन देवी के शैलपुत्री रूप की पूजा की जाती है। ‘शैल’ का अर्थ पर्वत होता है। पर्वतराज हिमालय की पुत्री के रूप में देवी के इस स्वरूप को जाना जाता है।

2. ब्रह्मचारिणी

दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी देवी की पूजा की जाती है। यह रूप तपस्या, संयम और साधना से जुड़ा हुआ माना जाता है।

3. चंद्रघंटा

तीसरे दिन चंद्रघंटा देवी की पूजा की जाती है। देवी के मस्तक पर अर्धचंद्र घंटी के समान दिखाई देता है, इसलिए इनका नाम चंद्रघंटा पड़ा, ऐसा कहा जाता है।

4. कूष्मांडा

चौथे दिन कूष्मांडा देवी की पूजा की जाती है। देवी का यह रूप सृष्टि की ऊर्जा और जीवनदायिनी शक्ति से जुड़ा हुआ माना जाता है।

5. स्कंदमाता

पाँचवें दिन स्कंदमाता देवी की पूजा की जाती है। भगवान कार्तिकेय अर्थात स्कंद की माता होने के कारण देवी के इस रूप को स्कंदमाता कहा जाता है।

6. कात्यायनी

छठे दिन कात्यायनी देवी की पूजा की जाती है। देवी का यह रूप शक्ति और पराक्रम से जुड़ा हुआ माना जाता है।

7. कालरात्रि

सातवें दिन कालरात्रि देवी की पूजा की जाती है। देवी का यह रूप उग्र माना जाता है और दुष्ट शक्तियों का नाश करने वाली शक्ति के रूप में इसकी उपासना की जाती है।

8. महागौरी

आठवें दिन महागौरी देवी की पूजा की जाती है। उनका स्वरूप शुद्धता और पवित्रता से जुड़ा हुआ माना जाता है।

9. सिद्धिदात्री

नौवें दिन सिद्धिदात्री देवी की पूजा की जाती है। नाम के अनुसार देवी को सिद्धियाँ प्रदान करने वाली माना जाता है।

इन नौ रूपों की उपासना के कारण नवरात्र के प्रत्येक दिन को विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त होता है।

घटस्थापना क्या है?

नवरात्र की शुरुआत में कई घरों और मंदिरों में घटस्थापना की जाती है।

घट अर्थात कलश। भारतीय धार्मिक परंपरा में कलश को मंगल और पवित्र माना जाता है। कलश में जल भरकर उसके ऊपर नारियल और पत्तों की व्यवस्था की जाती है। कुछ स्थानों पर कलश के आसपास या उसके पास अनाज बोने की परंपरा भी है।

नवरात्रि के लिए सजाया गया कलश, नारियल, आम के पत्ते, गेंदे के फूल और प्रज्वलित अखंड दीपक
नवरात्रि में घटस्थापना और अखंड ज्योति का शुभ प्रतीक।

बोए गए अनाज में कुछ दिनों बाद अंकुर निकल आते हैं। कई जगह इन अंकुरों को शुभता, समृद्धि और जीवन के विकास का प्रतीक माना जाता है।

घटस्थापना की विधि अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों की परंपराओं के अनुसार कुछ अलग हो सकती है।

अखंड दीप की परंपरा

नवरात्र के दौरान कई घरों में अखंड दीप जलाने की परंपरा है।

नौ दिनों और नौ रातों तक दीप जलता रहे, ऐसी परंपरा कई परिवारों में देखने को मिलती है। भारतीय परंपरा में दीप को प्रकाश, पवित्रता और दैवी उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है।

अखंड दीप की विधि भी घर और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

महाराष्ट्र में नवरात्रोत्सव

महाराष्ट्र में नवरात्र देवी की उपासना का एक महत्वपूर्ण समय माना जाता है। कई जगह देवी की स्थापना की जाती है, घटस्थापना की जाती है और नौ दिनों तक आरती, भजन, जागरण तथा विभिन्न धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

महाराष्ट्र के नवरात्र में धार्मिक परंपराओं के साथ लोकसंस्कृति की भी सुंदर झलक दिखाई देती है।

इन्हीं लोकपरंपराओं में भोंडला या हादगा एक महत्वपूर्ण परंपरा है।

भोंडला क्या है?

महाराष्ट्र की नवरात्र परंपराओं में भोंडला या हादगा एक सुंदर लोकपरंपरा है। विशेष रूप से लड़कियाँ और महिलाएँ मिलकर इसे मनाती हैं।

बीच में पाट पर हाथी का चित्र या प्रतिमा रखी जाती है। उसके चारों ओर फेर बनाकर पारंपरिक भोंडला गीत गाए जाते हैं, तालियाँ बजाई जाती हैं और आनंद के साथ नृत्य किया जाता है।

कई जगह अंत में खिरापत बाँटने की भी परंपरा है।

भोंडले के गीतों में ग्रामीण जीवन, प्रकृति, खेती, परिवार, रिश्ते और लोकजीवन के कई रंग दिखाई देते हैं। इसलिए भोंडला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि महाराष्ट्र के लोकगीतों, महिलाओं की सामूहिक भागीदारी और पीढ़ियों से चली आ रही लोकपरंपराओं को जीवित रखने वाला लोकउत्सव भी है।

भोंडले की विधि और गीत महाराष्ट्र के अलग-अलग क्षेत्रों के अनुसार कुछ बदलते हुए दिखाई देते हैं।

नवरात्रोत्सव सार्वजनिक रूप से कैसे मनाया जाने लगा?

आज नवरात्र का नाम लेते ही हमारे सामने बड़े मंडप, देवी की भव्य मूर्तियाँ, सजावट, रोशनी, गरबा-दांडिया और सार्वजनिक कार्यक्रमों की तस्वीर आती है।

लेकिन उत्सव का यह वर्तमान सार्वजनिक स्वरूप एक ही दिन में नहीं बना।

भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में देवी की पूजा अलग-अलग तरीकों से होती आई है। कुछ स्थानों पर राजघराने, जमींदार या बड़े परिवार देवी की पूजा करते थे, जबकि कई जगह गाँव के लोग मिलकर अपनी स्थानीय परंपराओं के अनुसार देवी का उत्सव मनाते थे।

बंगाल की बारोवारी परंपरा

पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा के सार्वजनिक स्वरूप के विकास के इतिहास में गुप्तिपारा का उल्लेख मिलता है।

कुछ ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, स्थानीय लोगों ने मिलकर चंदा एकत्र करके सामुदायिक पूजा आयोजित करने की परंपरा विकसित की। “बारोवारी” शब्द सामूहिक आयोजन की इसी परंपरा से जुड़ा माना जाता है।

इस परंपरा की शुरुआत के समय को लेकर अलग-अलग उल्लेख मिलते हैं। इसलिए किसी एक वर्ष को सार्वजनिक दुर्गापूजा की निर्विवाद शुरुआत मानने के बजाय, इसे सामुदायिक पूजा के विकास का एक महत्वपूर्ण चरण मानना अधिक उचित है।

बाद में “सार्वजनिक” या “सभी के लिए खुली” पूजा की यह भावना और अधिक व्यापक होती गई।

कोलकाता की दुर्गापूजा को 2021 में UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की Representative List में शामिल किया गया।

गरबा क्या है?

नवरात्र का नाम आते ही गुजरात का गरबा याद आता है।

“गरबा” शब्द का संबंध गर्भ या गर्भदीप की संकल्पना से जोड़ा जाता है, ऐसी प्रचलित परंपरा है।

परंपरा में मिट्टी के एक पात्र में दीप रखा जाता है और उसके चारों ओर छेद वाला पात्र बनाया जाता है। इस प्रकाश के चारों ओर फेर बनाकर नृत्य किया जाता है।

गुजरात की परंपरा में गरबा देवीशक्ति की उपासना से जुड़ा एक सामूहिक लोकनृत्य है। गरबा करने वाले लोग गोलाकार रचना में नृत्य करते हैं और बीच में दीप या देवी की प्रतिमा हो सकती है।

इस परंपरा में मिट्टी के पात्र और उसके भीतर के प्रकाश को जीवन, सृष्टि और दैवी शक्ति से जोड़कर भक्तिपर अर्थ बताए जाते हैं।

इसलिए गरबा केवल नृत्य नहीं है, बल्कि देवी की उपस्थिति में भक्ति, संगीत और सामूहिक आनंद व्यक्त करने का एक तरीका भी माना जाता है।

UNESCO ने 2023 में “Garba of Gujarat” को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की Representative List में शामिल किया। UNESCO के अनुसार गरबा नवरात्र के अवसर पर शक्ति की उपासना से जुड़ा एक धार्मिक और भक्तिपूर्ण नृत्य है।

नवरात्रि में दीपक के चारों ओर गोलाकार घेरा बनाकर गरबा नृत्य करते हुए लोग
नवरात्र के पावन अवसर पर माँ दुर्गा की भक्ति और आनंद का प्रतीक पारंपरिक गरबा नृत्य।

गरबा गोलाकार क्यों किया जाता है?

गरबे की सबसे पहचानने योग्य बात उसका गोलाकार फेर है।

पारंपरिक गरबे में बीच में दीप या देवी का प्रतीक रखा जाता है और उसके चारों ओर लोग गोलाकार घूमते हुए नृत्य करते हैं।

गरबे के इस गोलाकार फेर को लोक और भक्तिपरंपराओं में जीवन के निरंतर चलने वाले चक्र से जोड़ा जाता है। कुछ परंपराओं में इसे जन्म और मृत्यु के चक्र का प्रतीक भी माना जाता है। बीच में रखा दीप या देवी का स्वरूप दैवी शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

इस तरह गरबे का फेर भक्ति, संगीत और सामूहिक आनंद को व्यक्त करने वाली परंपरा बन जाता है।

डांडिया और रास

नवरात्र में गरबे के साथ डांडिया भी बड़े उत्साह से किया जाता है।

डांडिया में हाथों में छोटी-छोटी रंग-बिरंगी लकड़ियाँ लेकर ताल के साथ नृत्य किया जाता है। कुछ लोकपरंपराओं में इन लकड़ियों को देवी के युद्ध में उपयोग किए गए शस्त्रों से जोड़ा जाता है।

गुजरात की रास परंपरा का संबंध भगवान श्रीकृष्ण की रासलीला से भी जोड़ा जाता है। इसलिए गरबा, डांडिया और रास इन सभी नृत्यपरंपराओं को धार्मिक और सांस्कृतिक दोनों संदर्भ प्राप्त हुए हैं।

पारंपरिक गरबा

आज के समय में गरबा बड़े मैदानों, संगीत कार्यक्रमों और भव्य आयोजनों में किया जाता है। लेकिन पारंपरिक गरबा अपेक्षाकृत सरल रूप में सामूहिक तरीके से किया जाता था।

गरबे में एक ताली, दो ताली और तीन ताली जैसी अलग-अलग ताल पद्धतियाँ देखने को मिलती हैं।

पारंपरिक गीत, तालियों की लय, सरल फेर और सामूहिक भागीदारी गरबे के महत्वपूर्ण हिस्से हैं।

आज आधुनिक संगीत और बड़े आयोजनों के कारण गरबे का स्वरूप काफी बदला है, लेकिन उसके पीछे की पारंपरिक भक्ति और सामूहिक भागीदारी आज भी बनी हुई है।

भारत के अलग-अलग हिस्सों में नवरात्र

भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में नवरात्र अलग-अलग तरीकों से मनाया जाता है।

महाराष्ट्र

महाराष्ट्र में घटस्थापना, देवी की पूजा, आरती, उपवास, शक्तिपीठों की यात्रा, भोंडला और सार्वजनिक नवरात्र मंडलों को विशेष महत्व दिया जाता है।

गुजरात

गुजरात में नवरात्र की रातों में गरबा और डांडिया रास विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।

पारंपरिक पोशाक, लोकसंगीत और सामूहिक नृत्य के कारण गुजरात का नवरात्र पूरे देश और दुनिया में अपनी अलग पहचान रखता है।

पश्चिम बंगाल

पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा एक बड़ा सांस्कृतिक उत्सव है।

विशाल पंडाल, कलात्मक मूर्तियाँ, ढाक की ध्वनि, सांस्कृतिक कार्यक्रम और देवी की प्रतिमा का विसर्जन इस उत्सव को एक अलग ही रूप देते हैं।

कोलकाता की दुर्गापूजा को 2021 में UNESCO की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की Representative List में शामिल किया गया।

उत्तर भारत

उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में नवरात्र के दौरान उपवास, देवी की पूजा, अखंड ज्योति और रामलीला का विशेष महत्व होता है।

नवरात्र के अंत में विजयादशमी के दिन श्रीराम की रावण पर विजय का उत्सव मनाया जाता है।

दक्षिण भारत

दक्षिण भारत के कई क्षेत्रों में नवरात्र के दौरान गोलू या बोम्मा गोलू सजाने की परंपरा है। सीढ़ियों पर देवी-देवताओं, संतों, पशु-पक्षियों और विभिन्न पात्रों की गुड़ियों को सजाकर घर को सुंदर बनाया जाता है।

कर्नाटक का मैसूर दशहरा अपनी अलग पहचान रखने वाली ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परंपरा है। मैसूर दशहरे की परंपरा देवी चामुंडेश्वरी और महिषासुर की कथा से जुड़ी हुई है। आज इसे कर्नाटक का नाडहब्बा अर्थात राज्य का प्रमुख उत्सव माना जाता है।

नवरात्र और स्त्रीशक्ति

नवरात्रोत्सव का एक महत्वपूर्ण पहलू स्त्रीशक्ति की उपासना है।

देवी को शक्ति का स्वरूप माना जाता है। दुर्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, काली और देवी के अन्य रूपों के माध्यम से भारतीय परंपरा में स्त्रीशक्ति के अलग-अलग रूपों को व्यक्त किया गया है।

नवरात्र के दौरान लड़कियों और महिलाओं की भागीदारी को भी कई परंपराओं में विशेष महत्व दिया जाता है।

कन्या पूजन ऐसी ही एक परंपरा है। कुछ स्थानों पर अष्टमी या नवमी के दिन छोटी कन्याओं को देवी का स्वरूप मानकर उनकी पूजा की जाती है और उन्हें भोजन कराया जाता है।

कन्या पूजन की विधि और दिन अलग-अलग क्षेत्रों की परंपराओं के अनुसार बदल सकते हैं।

नवरात्र का संदेश

नवरात्र केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में एक महत्वपूर्ण संदेश देने वाला समय भी है।

देवी और महिषासुर की कथा अधर्म पर धर्म और दुष्ट शक्तियों पर दैवी शक्ति की विजय को दर्शाती है।

भक्ति और लोकपरंपरा की दृष्टि से देखा जाए तो महिषासुर केवल एक पौराणिक असुर का नाम नहीं, बल्कि कथाओं में गलत और नकारात्मक प्रवृत्तियों के प्रतीक के रूप में भी सामने आता है।

नवरात्र हमें शक्ति, श्रद्धा, संयम और सही मार्ग पर टिके रहने की प्रेरणा देता है।

नवरात्र क्यों विशेष है?

नवरात्र विशेष होने के कई कारण हैं।

  • यह देवी की उपासना का महत्वपूर्ण समय है।
  • भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में इसे अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है।
  • धार्मिक श्रद्धा के साथ इसका लोककला और लोकसंस्कृति से भी गहरा संबंध है।
  • गरबा, डांडिया, भोंडला, दुर्गापूजा, गोलू और मैसूर दशहरा जैसी विभिन्न परंपराएँ इस उत्सव को और समृद्ध बनाती हैं।
  • स्त्रीशक्ति की उपासना को इस उत्सव में विशेष स्थान प्राप्त है।
  • यह परिवार, समाज और समुदाय को एक साथ जोड़ने वाला उत्सव है।

जिज्ञासा मंथन…

नवरात्र केवल नौ रातों का उत्सव नहीं है।

यह भक्ति का उत्सव है, शक्ति का उत्सव है, मातृशक्ति की आराधना का उत्सव है और भारतीय लोकसंस्कृति के विभिन्न रंगों का उत्सव है।

महिषासुरमर्दिनी की पौराणिक कथा हो, श्रीराम के अकालबोधन की भक्तिपरंपरा हो, नवदुर्गा की पूजा हो, घर की घटस्थापना हो, महाराष्ट्र का भोंडला हो, गुजरात का गरबा-डांडिया हो या बंगाल की भव्य दुर्गापूजा — हर परंपरा के पीछे कई पीढ़ियों की श्रद्धा, अनुभव और सांस्कृतिक स्मृतियाँ जुड़ी हुई हैं।

इसलिए नवरात्र को समझना केवल एक त्योहार के बारे में जानकारी प्राप्त करना नहीं है।

यह भारतीय संस्कृति में शक्ति की संकल्पना, भक्ति की परंपरा और लोकजीवन की विविधता को समझने की एक सुंदर यात्रा है।

देवी के सामने जलाया गया छोटा-सा दीप हो या हजारों लोगों द्वारा बनाया गया गरबे का फेर — दोनों के केंद्र में एक ही भावना दिखाई देती है:

“शक्ति की आराधना करें, अच्छाई के मार्ग पर चलें और अपनी संस्कृति की सुंदर परंपराओं को आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाएँ।”

जय माता दी!….🙏



संदर्भ

  • देवीमहात्म्य (दुर्गासप्तशती) — मार्कंडेय पुराण
  • कृत्तिवासी रामायण — अकालबोधन परंपरा के संदर्भ के लिए
  • UNESCO Intangible Cultural Heritage — Kolkata Durga Puja और Garba of Gujarat
  • Mysuru Dasara – आधिकारिक जानकारी — मैसूर दशहरा और चामुंडेश्वरी परंपरा

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