हमने पिछले लेख में जाना कि हिंदू पुराण क्या हैं, भारतीय परंपरा में उनका क्या स्थान है और उनमें किस तरह के धार्मिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक विचार मिलते हैं।
अब इसी श्रृंखला में एक बहुत पुराना और मन को सोचने पर मजबूर करने वाला सवाल सामने आता है—
यह सृष्टि बनी कैसे?
पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चंद्रमा, तारे, देवता, मनुष्य, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे अस्तित्व में आने से पहले क्या था?
इस विशाल सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई?
सृष्टि की रचना किसने की?
ब्रह्मदेव की इसमें क्या भूमिका है?
भगवान विष्णु और ब्रह्मदेव का सृष्टि से क्या संबंध है?
और हिरण्यगर्भ आखिर क्या है?
इन सवालों के जवाब भारतीय धार्मिक परंपरा में केवल एक ही वर्णन तक सीमित नहीं हैं।
सृष्टि के बारे में विचार केवल पुराणों से शुरू नहीं होते। उनकी जड़ें वैदिक परंपरा में भी दिखाई देती हैं। वेदों में सृष्टि के आरंभ में क्या था, विश्व की उत्पत्ति कैसे हुई और इस पूरे अस्तित्व के पीछे कौन-सा मूल तत्त्व हो सकता है, इन विषयों पर विचार किया गया है।
बाद में उपनिषदों में इन विचारों को और अधिक दार्शनिक रूप मिला और पुराणों में सृष्टि से जुड़ी अनेक धार्मिक कथाएँ और परंपराएँ विस्तार से सामने आईं।
इसलिए हिंदू सृष्टि-विचार को समझने के लिए उसकी शुरुआत वेदों से करना अधिक उपयोगी है।आइए, इस पूरे विषय को आसान भाषा में समझते हैं।
विषय सूची
- सूक्त क्या होता है?
- सृष्टि का सवाल वेदों में भी पूछा गया था
- नासदीय सूक्त में क्या कहा गया है?
- हिरण्यगर्भ क्या है?
- हिरण्यगर्भ सूक्त में क्या विचार मिलता है?
- सुवर्ण अंड या ब्रह्मांड क्या है?
- क्या हिरण्यगर्भ और बाद का सुवर्ण अंड एक ही बात है?
- वेदों से पुराणों तक सृष्टि-विचार का सफर
- सृष्टि के प्रकट होने से पहले क्या था?
- भगवान विष्णु और ब्रह्मदेव का सृष्टि से क्या संबंध है?
- ब्रह्मदेव की सृष्टिकर्ता के रूप में भूमिका
- सृष्टि की रचना में पंचमहाभूतों का विचार
- ब्रह्मांड और विराट पुरुष
- अलग-अलग पुराणों में सृष्टि के वर्णन अलग क्यों हैं?
- वैष्णव, शैव और दूसरी परंपराओं में सृष्टि-विचार
- क्या सृष्टि केवल एक बार बनी है?
- युग क्या हैं?
- कल्प क्या है?
- मनु और मन्वंतर
- प्रजापतियों का सृष्टि में स्थान
- ऋषि और सप्तर्षि
- फिर सृष्टि की “सच्ची” मांडणी कौन-सी है?
- अंत में…
सूक्त क्या होता है?
वेदों में अनेक मंत्र अलग-अलग विषयों, देवताओं और आध्यात्मिक विचारों से जुड़े हुए हैं। ऐसे मंत्रों के किसी विशेष समूह को “सूक्त” कहा जाता है।
सरल शब्दों में कहें तो किसी विशेष विषय पर विचार व्यक्त करने वाले मंत्रों के समूह को सूक्त कहा जा सकता है।
ऋग्वेद में सृष्टि से जुड़े विचार प्रस्तुत करने वाले कुछ महत्वपूर्ण सूक्त मिलते हैं। इनमें नासदीय सूक्त और हिरण्यगर्भ सूक्त विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
सृष्टि का सवाल वेदों में भी पूछा गया था
आज जब हम ब्रह्मांड की उत्पत्ति की बात करते हैं, तो हमारे सामने अंतरिक्ष, आकाशगंगाएँ, तारे, ग्रह और पृथ्वी जैसी बातें आती हैं।
लेकिन हजारों वर्ष पहले भारतीय ऋषियों ने भी एक बहुत मूलभूत सवाल पूछा था—सृष्टि के आरंभ में आखिर क्या था?
ऋग्वेद का नासदीय सूक्त (ऋग्वेद 10.129) इसी तरह के सवालों पर विचार करता है।
यह सूक्त इसलिए विशेष है क्योंकि इसमें सृष्टि की शुरुआत के बारे में कोई बहुत सरल और निश्चित उत्तर नहीं दिया गया। इसके बजाय सृष्टि के आरंभ की उस रहस्यमय अवस्था पर सवाल उठाए गए हैं, जिसे समझना आसान नहीं है।
नासदीय सूक्त में क्या कहा गया है?
नासदीय सूक्त के शुरुआती विचारों में सृष्टि के आरंभ की ऐसी अवस्था का वर्णन मिलता है, जब आज हम जिन चीजों को “अस्तित्व” और “अनस्तित्व”, “दिन” और “रात” या विश्व की दूसरी परिचित अवस्थाओं के रूप में समझते हैं, वे उस तरह स्पष्ट रूप से मौजूद नहीं थीं।
उस समय आकाश भी नहीं था और आकाश के पार क्या था, यह भी बताना संभव नहीं था—ऐसा एक गहरा और रहस्यमय विचार इस सूक्त में मिलता है।
तब सवाल उठता है—सृष्टि के आरंभ में आखिर क्या था?
उस मूल अवस्था में कौन-सा तत्त्व था?
सृष्टि की शुरुआत कैसे हुई?
सृष्टि के प्रकट होने के पीछे कौन-सी शक्ति या तत्त्व था?
सूक्त आगे इस बात पर विचार करता है कि उस शुरुआती अवस्था से सृष्टि किस तरह प्रकट हुई होगी।
लेकिन इस सूक्त की सबसे खास बात इसके अंतिम हिस्से में दिखाई देती है।
यहाँ सवाल उठाया जाता है कि सृष्टि की वास्तविक शुरुआत कैसे हुई, यह क्या किसी को पूरी तरह मालूम है? क्या उस सर्वोच्च तत्त्व को भी यह पूरी तरह पता है? या शायद सृष्टि की शुरुआत वास्तव में कैसे हुई, यह कोई भी पूरी तरह नहीं जानता?
इसी तरह का प्रश्न नासदीय सूक्त को विशेष बनाता है।
इसलिए नासदीय सूक्त को केवल “सृष्टि कैसे बनी” इसका निश्चित उत्तर देने वाला सूक्त मानने के बजाय, सृष्टि के आरंभ के रहस्य पर गहराई से विचार करने वाला वैदिक सूक्त समझना अधिक उचित है।
इससे भारतीय परंपरा की एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—सृष्टि के बारे में सवाल पूछना और उसके रहस्य को समझने की कोशिश करना भी एक बहुत पुरानी परंपरा है।
हिरण्यगर्भ क्या है?
सृष्टि की उत्पत्ति से जुड़ी एक और महत्वपूर्ण वैदिक संकल्पना है—हिरण्यगर्भ।
“हिरण्य” का अर्थ है सोना या स्वर्ण, जबकि “गर्भ” का अर्थ गर्भ, बीज या भीतर स्थित मूल अवस्था से लिया जा सकता है।
इस तरह हिरण्यगर्भ का सामान्य अर्थ “स्वर्ण गर्भ” या “सुवर्ण गर्भ” समझा जा सकता है।

ऋग्वेद में हिरण्यगर्भ सूक्त (10.121) मिलता है। इस सूक्त में हिरण्यगर्भ को सृष्टि के आरंभ से जुड़े एक मूल तत्त्व के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
हिरण्यगर्भ सूक्त में क्या विचार मिलता है?
हिरण्यगर्भ के माध्यम से विश्व की शुरुआत से जुड़े एक आद्य या मूल तत्त्व पर विचार किया जाता है।
सृष्टि के प्रकट होने से पहले की उस मूल अवस्था और पूरे अस्तित्व के बीच संबंध की कल्पना इस सूक्त में दिखाई देती है। उसमें समस्त जीवों और अस्तित्व को धारण करने वाले तत्त्व का विचार सामने आता है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण सवाल भी उठता है—इस विशाल विश्व का आधार क्या है?
संपूर्ण अस्तित्व को धारण करने वाला मूल तत्त्व कौन-सा है?
इस तरह हिरण्यगर्भ केवल “स्वर्ण रंग के गर्भ” का शब्दशः अर्थ नहीं रह जाता, बल्कि वह विश्व के मूल तत्त्व से जुड़ी एक धार्मिक और दार्शनिक संकल्पना के रूप में सामने आता है।
इसलिए नासदीय सूक्त और हिरण्यगर्भ सूक्त में एक दिलचस्प अंतर दिखाई देता है।
नासदीय सूक्त सृष्टि के आरंभ के रहस्य पर सवाल और चिंतन करता है। वहीं हिरण्यगर्भ सूक्त सृष्टि के मूल तत्त्व को एक केंद्र में रखकर उसके बारे में विचार प्रस्तुत करता है।
सुवर्ण अंड या ब्रह्मांड क्या है?
बाद की भारतीय धार्मिक और पुराण परंपराओं में सृष्टि के प्रकट होने का वर्णन करते समय सुवर्ण अंड या ब्रह्मांड जैसी कल्पनाएँ मिलती हैं।
“अंड” की यह कल्पना अपने आप में बहुत अर्थपूर्ण है।
अंडे के भीतर आगे विकसित होने वाले जीवन का बीज छिपा होता है। इसलिए एक बंद और बीज के समान अवस्था से आगे चलकर विशाल सृष्टि के विस्तार की कल्पना इस प्रतीक के माध्यम से समझाई जाती है।
कुछ धार्मिक वर्णनों में आद्य जलरूप अवस्था से जुड़े सुवर्णवर्ण के अंड या ब्रह्मांड के प्रकट होने की बात कही गई है।
इसके बाद उससे विश्व की रचना और सृष्टि के विस्तार का क्रम शुरू होने की परंपरा मिलती है।यहाँ “ब्रह्मांड” शब्द को केवल आज के वैज्ञानिक अर्थ में “Universe” समझना उचित नहीं है।भारतीय धार्मिक विश्व-कल्पना में ब्रह्मांड का अर्थ पूरी विश्व-व्यवस्था और उसके अलग-अलग स्तरों से जुड़ा व्यापक विचार है।
इसलिए सुवर्ण अंड की कल्पना को भारतीय धार्मिक सृष्टि-विचार की एक महत्वपूर्ण प्रतीकात्मक कल्पना के रूप में समझना चाहिए।
हालाँकि इसे आधुनिक विज्ञान के किसी विशेष सिद्धांत के समान मानना उचित नहीं होगा।
क्या हिरण्यगर्भ और बाद का सुवर्ण अंड एक ही बात है?
यहाँ एक बात समझना जरूरी है। ऋग्वेद में हिरण्यगर्भ एक वैदिक संकल्पना है।बाद की भारतीय धार्मिक परंपराओं में सृष्टि के आरंभ से जुड़ी सुवर्ण अंड, ब्रह्मांड या विश्व-अंड जैसी कल्पनाएँ अधिक विस्तार से दिखाई देती हैं।
इन सभी का संबंध सृष्टि की शुरुआती अवस्था से जरूर है, लेकिन उन्हें बिल्कुल एक ही वर्णन या एक ही अवधारणा मानना उचित नहीं होगा।
सरल रूप में इसे इस तरह समझ सकते हैं—
वैदिक परंपरा का हिरण्यगर्भ → आगे की धार्मिक परंपराओं में विकसित सृष्टि की विस्तृत विचार इस तरह इनके बीच संबंध और विकास को समझना अधिक उचित है।
वेदों से पुराणों तक सृष्टि-विचार का सफर
अब तक हमने वैदिक परंपरा के दो महत्वपूर्ण विचार समझे—
नासदीय सूक्त — सृष्टि के आरंभ के रहस्य पर सवाल और चिंतन।
हिरण्यगर्भ सूक्त — सृष्टि के मूल तत्त्व पर विचार।
इसके बाद भारतीय धार्मिक परंपरा का विस्तार होता गया।
विभिन्न देवताओं, ऋषि परंपराओं, मनु, प्रजापति, युगों, मन्वंतर और विश्व की रचना से जुड़े विचार अधिक विस्तार से सामने आए।
इसी परंपरा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं पुराण।
पुराणों में सृष्टि का विचार केवल “ब्रह्मांड की शुरुआत” तक सीमित नहीं है।
देवता, ऋषि, मनुष्य, पशु-पक्षी, वनस्पति, पंचमहाभूत, विभिन्न लोक और विश्व की पूरी व्यवस्था भी सृष्टि-विचार का हिस्सा बनती है।
इसलिए पुराणों में “सृष्टि” का अर्थ आज के सामान्य अर्थ में केवल “दुनिया की रचना” से कहीं व्यापक है।
सृष्टि के प्रकट होने से पहले क्या था?
पुराणों में दिए गए कई सृष्टि-वर्णनों के अनुसार, सृष्टि के लय के बाद विश्व अपने वर्तमान रूप में प्रकट नहीं रहता।
उसे एक अव्यक्त या सूक्ष्म अवस्था में माना जाता है।
कुछ वर्णनों में चारों ओर जलरूप अवस्था होने की बात कही गई है।
इसी पृष्ठभूमि में वैष्णव परंपरा की एक बहुत प्रसिद्ध धार्मिक छवि सामने आती है—
अनंतशेष पर योगनिद्रा में विराजमान भगवान विष्णु।
इस अवस्था में आगे आने वाली सृष्टि का बीजभाव मौजूद है, ऐसी धार्मिक परंपरा में मान्यता मिलती है।
इस तरह यहाँ सृष्टि को केवल एक बार हुई घटना के रूप में नहीं, बल्कि सृष्टि, स्थिति और लय के चक्र से जोड़कर देखा जाता है।
भगवान विष्णु और ब्रह्मदेव का सृष्टि से क्या संबंध है?
भगवान विष्णु से जुड़े सृष्टि-वर्णनों में एक बहुत प्रसिद्ध धार्मिक परंपरा मिलती है।
सृष्टि की आद्य अवस्था में भगवान विष्णु को अनंतशेष पर शयन करते हुए बताया गया है। उनकी नाभि से एक कमल प्रकट होता है और उस कमल पर ब्रह्मदेव प्रकट होते हैं।

इसके बाद ब्रह्मदेव से सृष्टि के विस्तार का कार्य शुरू होता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण के तीसरे स्कंध में भगवान की नाभि से प्रकट हुए कमल पर ब्रह्मदेव के प्रकट होने और आगे सृष्टि के विस्तार से जुड़े वर्णन मिलते हैं। यहाँ दोनों देवताओं की भूमिका को समझना महत्वपूर्ण है।
वैष्णव परंपरा में भगवान विष्णु या नारायण को आद्य दैवी तत्त्व के रूप में केंद्र में रखा जाता है, जबकि ब्रह्मदेव को सृष्टि के प्रत्यक्ष विस्तार और रचना से जुड़े देवता के रूप में देखा जाता है।
इसलिए यह पूछने के बजाय कि “सृष्टि भगवान विष्णु ने बनाई या ब्रह्मदेव ने?”, इस परंपरा में दोनों की भूमिकाओं के आपसी संबंध को समझना अधिक उचित है।
ब्रह्मदेव की सृष्टिकर्ता के रूप में भूमिका
हिंदू धार्मिक परंपरा में ब्रह्मदेव को सृष्टि के सृजन और विस्तार से जुड़े देवता के रूप में माना जाता है।
लेकिन पुराणों में सृष्टि का अर्थ केवल पृथ्वी पर मनुष्य और पशु-पक्षियों का निर्माण नहीं है। इसमें कई स्तरों का विचार किया जाता है।
जैसे—- देवता- ऋषि- मनुष्य- पशु- पक्षी- वनस्पति- स्थावर-जंगम सृष्टि- विभिन्न लोक- पंचमहाभूत- सूक्ष्म तत्त्व- इंद्रियाँ और उनसे जुड़े कार्य।
इसलिए ब्रह्मदेव की सृष्टि-रचना को एक पल में तैयार हो जाने वाली दुनिया की सरल कहानी के रूप में नहीं, बल्कि विश्व-व्यवस्था के धीरे-धीरे प्रकट होने के धार्मिक और दार्शनिक विचार के रूप में समझा जा सकता है।
सृष्टि की रचना में पंचमहाभूतों का विचार
भारतीय दर्शन परंपरा में सृष्टि को समझाते समय पंचमहाभूतों का विचार महत्वपूर्ण माना गया है।ये पाँच महाभूत हैं—
आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी।

कुछ दार्शनिक सृष्टि-वर्णनों में प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, तन्मात्राएँ और उसके बाद पंचमहाभूतों के विकास के क्रम के माध्यम से विश्व के प्रकट होने की कल्पना की गई है।
श्रीमद्भागवत के तीसरे स्कंध में भी महत्तत्त्व, अहंकार, सूक्ष्म तत्त्वों और पंचमहाभूतों से संबंधित सृष्टि-विचार मिलता है।
इससे एक बात समझ में आती है—पुराणों का सृष्टि-विचार केवल देवताओं के प्रकट होने तक सीमित नहीं है। इसमें विश्व की रचना और अस्तित्व के स्वरूप पर दार्शनिक विचार भी शामिल हैं।
ब्रह्मांड और विराट पुरुष
भारतीय धार्मिक परंपरा में विश्व को समझाने के लिए अलग-अलग प्रतीकों का और विचारों का उपयोग किया गया है।
कहीं ब्रह्मांड या सुवर्ण अंड का विचार दिखाई देती है। तो कहीं विराट पुरुष का।
विराट पुरुष का अर्थ ऐसी धार्मिक विचार से है, जिसमें पूरे विश्व को एक विराट दैवी स्वरूप से जोड़कर देखा जाता है।

इससे पता चलता है कि भारतीय सृष्टि-विचार में केवल एक ही प्रतीक या एक ही विचार का उपयोग नहीं हुआ।
कहीं हिरण्यगर्भ, कहीं सुवर्ण अंड, कहीं ब्रह्मांड और कहीं विराट पुरुष के माध्यम से विश्व को समझने का प्रयास किया गया है।
अलग-अलग पुराणों में सृष्टि के वर्णन अलग क्यों हैं?
यह सवाल स्वाभाविक है।
अगर सृष्टि एक ही है, तो अलग-अलग पुराणों में उसके वर्णन अलग-अलग क्यों दिखाई देते हैं?
इसका एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि हिंदू धर्मग्रंथों की परंपरा बहुत विशाल और लंबे समय तक चलने वाली रही है।
पुराणों से जुड़ी अनेक धार्मिक परंपराएँ लंबे समय तक मौखिक रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रहीं। बाद में अलग-अलग ग्रंथों में उनका संकलन और लेखन हुआ।
अलग-अलग क्षेत्रों, संप्रदायों और समय के अनुसार उनकी प्रस्तुति में भी कुछ अंतर दिखाई देते हैं।
इसलिए अलग-अलग ग्रंथों में भाषा, घटनाओं के क्रम, विवरण या वर्णन की शैली में कुछ अंतर होना स्वाभाविक है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि हर अंतर को किसी ने जानबूझकर बाद में बदल दिया होगा।
लंबी मौखिक परंपरा, अलग-अलग ग्रंथ-परंपराएँ, संकलन, स्थानीय धार्मिक वातावरण और समय के साथ भाषा में आए बदलाव—इन सभी का प्रभाव ग्रंथों की अलग-अलग परंपराओं पर पड़ सकता है।
इसलिए यदि किसी एक पुराण में सृष्टि का वर्णन दूसरे पुराण से थोड़ा अलग दिखाई देता है, तो तुरंत यह कहना आवश्यक नहीं कि इनमें से एक गलत है।
उसके बजाय उस पुराण की अपनी परंपरा, धार्मिक दृष्टिकोण और सृष्टि के बारे में उसकी मांडणी को उसके संदर्भ में समझना अधिक उचित है।
वैष्णव, शैव और दूसरी परंपराओं में सृष्टि-विचार
हिंदू धार्मिक परंपरा की एक विशेषता यह भी है कि अलग-अलग उपासना परंपराओं और संप्रदायों में एक ही विश्व-रहस्य को अलग-अलग दृष्टिकोणों से समझने का प्रयास किया गया है।
वैष्णव परंपरा में भगवान विष्णु या नारायण को सृष्टि के मूल दैवी तत्त्व से जोड़ने वाली मांडणी अधिक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
शैव परंपरा के कुछ ग्रंथों में भगवान शिव या परम तत्त्व को केंद्र में रखकर सृष्टि से जुड़े विचार प्रस्तुत किए जाते हैं।
कुछ वर्णनों में ब्रह्मदेव सृष्टिकर्ता के रूप में प्रमुख दिखाई देते हैं।
वहीं कुछ स्थानों पर हिरण्यगर्भ, प्रकृति, महत्तत्त्व, पंचमहाभूत या विराट पुरुष जैसी संकल्पनाओं पर अधिक जोर मिलता है।
इसलिए भारतीय सृष्टि-विचार किसी एक ही ढाँचे में सीमित नहीं है। यह अलग-अलग धार्मिक और दार्शनिक परंपराओं से समृद्ध हुआ एक व्यापक विचार-जगत है।
क्या सृष्टि केवल एक बार बनी है?
पुराण परंपरा के व्यापक विचार को देखें तो सृष्टि को चक्राकार माना गया है।
अर्थात—
सृष्टि → स्थिति → लय → फिर सृष्टि

यह चक्र चलता रहता है।
सृष्टि प्रकट होती है, उसका विस्तार होता है, वह एक निश्चित काल तक बनी रहती है और फिर एक अवस्था में उसका लय होता है। इसके बाद फिर सृष्टि के प्रकट होने का क्रम शुरू होता है।
इसलिए पुराण परंपरा में यह विचार हर जगह नहीं मिलता कि “विश्व केवल एक बार बना और उसके बाद हमेशा उसी रूप में बना रहा।”
इसके बजाय निर्माण और लय का लगातार चलता रहने वाला विश्व-चक्र एक महत्वपूर्ण विचार है।
युग क्या हैं?
इस बड़े कालचक्र में युगों का विशेष महत्व है।
हिंदू पुराण परंपरा में चार प्रमुख युग बताए गए हैं—
1. सत्ययुग या कृतयुग
2. त्रेतायुग
3. द्वापरयुग
4. कलियुग
इन चारों युगों को मिलाकर चतुर्युग या महायुग कहा जाता है।पुराण परंपरा में बताए गए कालमान के अनुसार इनके समय को इस प्रकार बताया जाता है—
| युग | कालावधि |
| सत्ययुग/ कृतयुग | 17,28,000 वर्ष |
| त्रेतायुग | 12,96,000 वर्ष |
| द्वापरयुग | 8,64,000 वर्ष |
| कलियुग | 4,32,000 वर्ष |
| एक चतुर्युग | 43,20,000 वर्ष |
यह कालगणना पुराण परंपरा के धार्मिक कालमान पर आधारित है।
इसकी तुलना आधुनिक वैज्ञानिक रूप से बताए गए ब्रह्मांड की आयु से सीधे करने के बजाय इसे भारतीय धार्मिक कालगणना के एक हिस्से के रूप में समझना अधिक उचित है।
कल्प क्या है?
युगों से भी बहुत बड़ा कालखंड कल्प कहलाता है।
पुराण परंपरा के अनुसार एक हजार चतुर्युगे ब्रह्मदेव का एक दिन, अर्थात एक कल्प माना जाता है।
इसके बाद उतनी ही लंबी अवधि की ब्रह्मदेव की रात होती है।मानवीय वर्षों के हिसाब से ब्रह्मदेव का एक दिन लगभग 4.32 अरब वर्ष माना जाता है।
एक कल्प में 14 मन्वंतर होने की बात पुराण परंपरा में कही गई है।
इस कालगणना से पता चलता है कि पुराणों में समय को मनुष्य के जीवनकाल से कहीं अधिक बड़े स्तर पर देखा गया है।
मनु और मन्वंतर
“मन्वंतर” को सरल भाषा में मनु का कालखंड समझ सकते हैं।
पुराण परंपरा के अनुसार एक कल्प में चौदह मन्वंतर होते हैं और प्रत्येक मन्वंतर के साथ एक मनु जुड़े होते हैं।
मनु को मानव समाज की व्यवस्था, धर्म और आगे की सृष्टि के विस्तार से जुड़े महत्वपूर्ण व्यक्तित्व के रूप में पुराणों में प्रस्तुत किया गया है।
विशेष रूप से स्वायंभुव मनु और शतरूपा का उल्लेख सृष्टि के शुरुआती वर्णनों में मिलता है।
इसी तरह पुराण परंपरा के अनुसार हम वर्तमान समय में वैवस्वत मनु के मन्वंतर में हैं।
प्रजापतियों का सृष्टि में स्थान
सृष्टि के आगे के विस्तार में प्रजापतियों का भी महत्वपूर्ण स्थान बताया गया है।
“प्रजा” का अर्थ जीवों या संतानों से जुड़ी सृष्टि और “पति” का अर्थ उससे संबंधित प्रमुख या स्वामी समझा जा सकता है।
दक्ष, मरीचि, अत्रि, अंगिरस, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ जैसे ऋषियों का आगे की सृष्टि के विस्तार से विभिन्न पुराणों में संबंध बताया गया है।
हालाँकि अलग-अलग ग्रंथों में प्रजापतियों की संख्या, उनके नाम और उनसे जुड़े विवरणों में कुछ अंतर दिखाई देता है।
इसलिए इन सभी परंपराओं को उनके अपने संदर्भ के साथ समझना आवश्यक है।
ऋषि और सप्तर्षि
भारतीय परंपरा में ऋषियों को ज्ञान, तपस्या, धर्म और आध्यात्मिक परंपरा के वाहक के रूप में सम्मान दिया गया है।
पुराणों में अलग-अलग मन्वंतर से जुड़े सप्तर्षियों का उल्लेख मिलता है।
अलग-अलग मन्वंतर में सप्तर्षियों के नाम अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी एक सूची को सभी पुराणों में समान मानना उचित नहीं होगा।
इससे एक महत्वपूर्ण बात समझ आती है—पुराणों का सृष्टि-विचार केवल जीवों की उत्पत्ति तक सीमित नहीं है। ज्ञान, धर्म और परंपरा की निरंतरता को भी इस विश्व-व्यवस्था का एक हिस्सा माना गया है।
फिर सृष्टि की “सच्ची” मांडणी कौन-सी है?
यह सवाल पढ़ते समय स्वाभाविक रूप से मन में आ सकता है।इसका उत्तर यह है कि हिंदू परंपरा में सृष्टि का केवल एक ही सर्वमान्य वर्णन नहीं है।
वेदों में सृष्टि के आरंभ को लेकर सवाल उठाए जाते हैं।हिरण्यगर्भ के माध्यम से मूल तत्त्व पर विचार किया जाता है।बाद की धार्मिक परंपराओं में सुवर्ण अंड और ब्रह्मांड जैसी कल्पनाएँ विकसित होती हैं।
पुराणों में भगवान विष्णु, ब्रह्मदेव, हिरण्यगर्भ, सुवर्ण अंड, ब्रह्मांड, प्रकृति, पंचमहाभूत और विराट पुरुष जैसी अलग-अलग संकल्पनाओं के माध्यम से सृष्टि को समझाने का प्रयास मिलता है।
इसलिए इन सभी वर्णनों को देखते समय एक बात ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है—
भारतीय परंपरा ने विश्व के रहस्य को समझने के लिए एक से अधिक मार्ग स्वीकार किए हैं।
हर परंपरा का अपना धार्मिक और दार्शनिक संदर्भ है और उसके माध्यम से सृष्टि को देखने का एक अलग दृष्टिकोण सामने आता हैl
अंत में…
सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई—यह सवाल आज भी इंसान को सोचने पर मजबूर करता है।
हजारों वर्ष पहले भारतीय ऋषियों ने भी यही सवाल उठाया था।ऋग्वेद का नासदीय सूक्त सृष्टि के आरंभ की रहस्यमय अवस्था को समझने का प्रयास करता है और सृष्टि की उत्पत्ति को लेकर बहुत मूलभूत सवाल उठाता है।
हिरण्यगर्भ सूक्त सृष्टि के मूल तत्त्व की ओर ध्यान आकर्षित करता है।
बाद की धार्मिक परंपराओं में सुवर्ण अंड और ब्रह्मांड जैसी कल्पनाओं के माध्यम से सृष्टि के प्रकट होने को अधिक विस्तार से समझाया गया।
और पुराण परंपरा में हमें अनंतशेष पर योगनिद्रा में विराजमान भगवान विष्णु, उनकी नाभि से प्रकट होने वाला कमल और उस कमल पर प्रकट होने वाले ब्रह्मदेव जैसे प्रसिद्ध धार्मिक वर्णन मिलते हैं।
इसके बाद ब्रह्मदेव से सृष्टि का विस्तार, प्रकृति और विभिन्न तत्त्वों की मांडणी, पंचमहाभूत, मनु, प्रजापति, ऋषि, युग, मन्वंतर और कल्प जैसी अनेक संकल्पनाओं के माध्यम से यह सृष्टि-विचार और व्यापक होता जाता है।
इन सभी वर्णनों में विवरण अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन एक व्यापक विचार बार-बार सामने आता है—सृष्टि प्रकट होती है, उसका विस्तार होता है, उसका लय होता है और फिर एक नई सृष्टि का चक्र शुरू होता है।
इसलिए हिंदू परंपरा का सृष्टि-विचार केवल इस एक सवाल का जवाब नहीं है कि—
“दुनिया की शुरुआत कैसे हुई?”
बल्कि यह विश्व, समय, जीवन, देवत्व और इस पूरे अस्तित्व के पीछे मौजूद मूल तत्त्व को समझने का एक व्यापक प्रयास है।
और शायद यही कारण है कि हजारों वर्ष पुराना यह विषय आज भी हमें आकर्षित करता है।
क्योंकि सवाल बहुत पुराना है, लेकिन आज भी हमारे मन में उठता है—
यह विशाल विश्व आखिर कहाँ से आया?
और उससे भी बड़ा सवाल—
इस पूरे अस्तित्व के पीछे आखिर कौन-सा तत्त्व है?

संदर्भ / ग्रंथस्रोत
- 1. ऋग्वेद 10.129 — नासदीय सूक्तसृष्टि के आरंभ की अवस्था और सृष्टि की उत्पत्ति के रहस्य पर विचार करने वाला महत्वपूर्ण वैदिक सूक्त।
- 2. ऋग्वेद 10.121 — हिरण्यगर्भ सूक्तहिरण्यगर्भ और सृष्टि के मूल तत्त्व से जुड़े वैदिक विचार।
- 3. श्रीमद्भागवत महापुराण — तृतीय स्कंधब्रह्मदेव का प्राकट्य, सृष्टि का विस्तार, महत्तत्त्व, अहंकार, पंचमहाभूत और विश्व-रचना से जुड़े वर्णन।
- 4. विष्णु पुराण — प्रथम अंशसृष्टि, ब्रह्मदेव, मनु, मन्वंतर और सृष्टि के चक्र से जुड़े वर्णन।
