नमस्कार पाठकों!
‘जिज्ञासा मंथन’ (Jigyasa Manthan) के हमारे इस नए ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है। आज हम डिजिटल दुनिया में एक नया कदम रख रहे हैं और इस रोमांचक सफर की शुरुआत में यह हमारा पहला लेख है।हमारी हिंदू संस्कृति में किसी भी शुभ, नए या महत्वपूर्ण काम की शुरुआत करते समय हम अक्सर कहते हैं, “चलो, आज इस काम का ‘श्रीगणेश’ करते हैं!” लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस सरल से वाक्य के पीछे का रहस्य क्या है? इसके पीछे एक बहुत बड़ा इतिहास और शिवपुराण की एक बेहद सुंदर कथा छिपी है, जो आज के जमाने के ‘स्मार्ट वर्क’ (Smart Work) का सबसे बेहतरीन उदाहरण है।
तो चलिए, इस पहले लेख में जानते हैं कि किसी भी काम की शुरुआत में हम सबसे पहले गणपति बप्पा का नाम क्यों लेते हैं।
शिवपुराण की प्रामाणिक कथा: बुद्धि बनाम शारीरिक गति….
हिंदू धर्म में गणपति बप्पा को ‘प्रथमपूज्य’ (जिनकी पूजा सबसे पहले की जाती है) और ‘विघ्नहर्ता’ माना जाता है। इसके पीछे शिवपुराण की ‘रुद्रसंहिता’ (कुमारखंड) में एक बहुत ही रोचक कथा मिलती है।एक बार भगवान शिव और माता पार्वती के पास एक दिव्य ज्ञानरूपी फल था। यह फल किसे मिले, इसके लिए उन्होंने अपने दोनों पुत्रों— भगवान कार्तिकेय और श्री गणेश के बीच एक प्रतियोगिता रखी।प्रतियोगिता की शर्त स्पष्ट थी: “तुम दोनों में से जो कोई भी पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके सबसे पहले वापस आएगा, उसे यह दिव्य फल दिया जाएगा और उसी को संसार में प्रथम पूजा का मान मिलेगा।”

कार्तिकेय का ‘हार्ड वर्क’ और बप्पा का ‘स्मार्ट वर्क’
यह शर्त सुनते ही कार्तिकेय जी अपने वाहन ‘मयूर’ (मोर) पर सवार हुए और अत्यंत वेग से पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल गए।दूसरी ओर, गणपति बप्पा का वाहन ‘मूषक’ (छोटा चूहा) था। चूहे पर बैठकर कार्तिकेय की गति से मुकाबला करना असंभव था। लेकिन गणपति जी बुद्धि के देवता हैं! उन्होंने शारीरिक शक्ति का उपयोग करने के बजाय अपनी अगाध बुद्धि का उपयोग किया। उन्होंने माता पार्वती और भगवान शिव को एक आसन पर बैठाया और अत्यंत आदर के साथ उनके चक्कर (परिक्रमा) लगाए।

”माता-पिता के चरणों में ही संपूर्ण ब्रह्मांड है!”
जब शिव-पार्वती ने गणेश जी से पूछा कि, “तुम पृथ्वी की परिक्रमा पर न जाकर, हमारे चक्कर क्यों लगा रहे हो?”तब गणपति बप्पा ने अत्यंत सुंदर और भावुक उत्तर दिया: “माता-पिता के चरणों में ही संपूर्ण ब्रह्मांड और पृथ्वी समाहित है। मैंने आपकी परिक्रमा की, यानी मेरी संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा पूरी हो गई।”बप्पा का यह चतुर और भावपूर्ण उत्तर सुनकर शिव-पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने कार्तिकेय के वापस आने से पहले ही वह फल गणपति को दे दिया। साथ ही यह वरदान दिया कि संसार में किसी भी शुभ या नए काम की शुरुआत करते समय सबसे पहले गणपति का स्मरण या पूजा की जाएगी।

तभी से किसी भी नए काम की शुरुआत करने को ‘श्रीगणेश करना’ कहने की परंपरा शुरू हो गई।
ऐतिहासिक और व्यावहारिक संदर्भ:
शिक्षा की शुरुआतइस पौराणिक कथा के अलावा, इस शब्द का एक ऐतिहासिक और शैक्षणिक महत्व भी है। पुराने समय में जब छोटे बच्चों को अक्षर सिखाने की शुरुआत (विद्यारंभ संस्कार) होती थी, तब स्लेट (पाटी) या धूल पर सबसे पहले ‘श्री गणेशाय नमः’ लिखकर दिया जाता था। यानी, जीवन की शिक्षा की पहली कड़ी बप्पा के नाम से ही शुरू होती थी।

’श्री’ और ‘गणेश’ शब्द का सही अर्थ क्या है?
श्री : इसका अर्थ है लक्ष्मी, समृद्धि, शोभा और यश।
गणेश : इसका अर्थ है सभी गणों (शक्तियों या लोगों) के स्वामी।
जब हम कहते हैं कि “चलो श्रीगणेश करते हैं”, तो उसका सीधा अर्थ होता है कि हम अपने काम की शुरुआत ऐसी सकारात्मक शक्ति का नाम लेकर कर रहे हैं, जिससे हमारे काम में कोई बाधा नहीं आएगी और हमें जीवन में यश व समृद्धि मिलेगी।
निष्कर्ष (Conclusion)
आज के आधुनिक युग में जिसे हम ‘Smart Work’ कहते हैं, उसके सबसे पहले और बेहतरीन उदाहरण गणपति बप्पा हैं! भगवान कार्तिकेय ने ‘Hard Work’ (शारीरिक मेहनत) किया, जबकि बप्पा ने ‘Smart Work’ (बुद्धि का सही उपयोग) करके सफलता हासिल की।’जिज्ञासा मंथन’ के इस पहले लेख के माध्यम से हम भी इसी सकारात्मक विचार को लेकर आगे बढ़ रहे हैं।आपकी बारी:क्या आपको ‘श्रीगणेश करने’ के पीछे का यह रोचक इतिहास और शिवपुराण की यह कथा पहले से पता थी? हमें नीचे Comment करके जरूर बताएं। अगर यह जानकारी आपको पसंद आई हो, तो इसे अपने मित्र-परिवार के साथ WhatsApp और Social Media पर जरूर Share करें!