महाराष्ट्र की मिट्टी में जिस एक उत्सव की सबसे ज्यादा उत्सुकता से प्रतीक्षा की जाती है, वह उत्सव है ‘आषाढ़ एकादशी’। सिर पर तुलसी वृंदावन, हाथ में ताल-मृदंग और मुख पर “राम कृष्ण हरी” का गजर करते हुए लाखों वारकरी जब पंढरपूर की ओर पैदल निकलते हैं, तो वह केवल एक यात्रा नहीं बल्कि भक्ति का एक जीवंत महासागर होता है।
लेकिन, एकादशी का असल अर्थ क्या है? एकादशी के उपवास की शुरुआत कब और किसने की? वारी का इतिहास क्या है? और आषाढ़ी को ‘देवशयनी’ क्यों कहा जाता है? इन सभी सवालों की विस्तृत और सटीक जानकारी हम इस लेख में जानेंगे।
विषय सूची
- एकादशी का अर्थ और महत्व
- एकादशी के व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा
- एकादशी का उपवास क्यों किया जाता है?
- आषाढ़ी एकादशी और देवशयनी एकादशी
- पंढरपुर और भगवान विठ्ठल का इतिहास
- पंढरपुर की वारी का इतिहास
- वारी का अनुशासन और उसका पूरा प्रबंधन
- भाग 7: शासकीय महापूजा और 24 घंटे दर्शन
- आषाढ़ी वारी का अनुभव कुछ अलग ही होता है…
एकादशी का अर्थ और महत्व
’एकादशी’ शब्द का अर्थ समझने के लिए हमें हिंदू पंचांग (कैलेंडर) को समझना होगा।
एकादशी का अर्थ: हिंदू महीने में दो ‘पक्ष’ (पखवाड़े) होते हैं—अमावस्या के बाद आने वाला ‘शुक्ल पक्ष’ और पूर्णिमा के बाद आने वाला ‘कृष्ण पक्ष’। इन दोनों पक्षों में १५-१५ तिथियां होती हैं। ग्यारहवीं तिथि को ‘एकादशी’ (एक + दश = ग्यारह) कहा जाता है।
वर्षभर की एकादशियाँ: एक महीने में २ एकादशी आती हैं, यानी १२ महीनों में कुल २४ एकादशी होती हैं। जब अधिक मास (मल मास/लीप महीना) आता है, तब उस वर्ष २६ एकादशियाँ होती हैं।
एकादशी के व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा
एकादशी के व्रत के पीछे एक प्रसिद्ध पौराणिक कथा सुनाई जाती है। पद्मपुराण के अनुसार, मुर नाम का एक राक्षस था। उसने देवताओं को परेशान कर रखा था। उससे युद्ध करते हुए भगवान विष्णु एक गुफा में विश्राम करने चले गए।
इसी दौरान मुर राक्षस ने उन पर हमला करने की कोशिश की। तभी भगवान विष्णु की दिव्य शक्ति से एक देवी प्रकट हुईं और उन्होंने मुर राक्षस का वध कर दिया।
जब भगवान विष्णु को इस बात का पता चला, तो वे प्रसन्न हुए और देवी से वरदान मांगने को कहा। देवी ने वरदान मांगा कि जो भी व्यक्ति इस दिन श्रद्धा से व्रत और पूजा करेगा, उसे पुण्य प्राप्त हो।
धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी के इसी वरदान के कारण इस तिथि का नाम एकादशी पड़ा। तभी से इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत और नामस्मरण का विशेष महत्व माना जाने लगा।
यह कथा एकादशी के धार्मिक महत्व को समझाती है। हर महीने दो एकादशी आती हैं। एक शुक्ल पक्ष में और दूसरी कृष्ण पक्ष में। इस तरह सामान्य रूप से साल में 24 एकादशी होती हैं। अधिक मास आने पर इनकी संख्या बढ़ जाती है।
आज भी बहुत से लोग श्रद्धा से एकादशी का व्रत रखते हैं। कोई पूरे दिन अन्न नहीं खाता, तो कोई फलाहार करके व्रत करता है। हर परिवार और परंपरा में इसे मनाने का तरीका थोड़ा अलग हो सकता है।

एकादशी का उपवास क्यों किया जाता है?
एकादशी का नाम आते ही सबसे पहले उपवास, पूजा और भगवान विष्णु का स्मरण याद आता है। लेकिन इस दिन उपवास रखने के पीछे क्या भावना है?
हिंदू परंपरा में उपवास का मतलब केवल खाना छोड़ देना नहीं है। इसका एक अर्थ अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखना भी है। इस दिन लोग अपनी रोजमर्रा की भागदौड़ से थोड़ा समय निकालकर पूजा-पाठ, भजन, कीर्तन और भगवान के नाम का स्मरण करते हैं।
एकादशी के दिन कई लोग खाना खाने से परहेज करते हैं। कुछ लोग फल, दूध और व्रत में खाए जाने वाले दूसरे पदार्थ लेते हैं, जबकि कुछ लोग अपनी श्रद्धा के अनुसार पूरा उपवास रखते हैं।
हालांकि उपवास करने का तरीका हर व्यक्ति की सेहत और क्षमता के अनुसार अलग हो सकता है। उपवास का मतलब अपने शरीर को तकलीफ देना नहीं है। इसका मुख्य उद्देश्य श्रद्धा, संयम और भक्ति के साथ दिन बिताना है।
आषाढ़ी एकादशी और देवशयनी एकादशी
आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को आषाढ़ी एकादशी कहा जाता है। इसे देवशयनी एकादशी भी कहते हैं। महाराष्ट्र में इस दिन का खास महत्व है, क्योंकि इसी अवसर पर लाखों वारकरी पंढरपुर पहुंचते हैं और भगवान विठ्ठल के दर्शन करते हैं।
हिंदू धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवशयनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं। इसके बाद कार्तिक महीने की प्रबोधिनी एकादशी को वे जागते हैं।
देवशयनी एकादशी से चातुर्मास की शुरुआत मानी जाती है। यह लगभग चार महीने का समय होता है। इस दौरान कई लोग व्रत, पूजा, जप और दान-पुण्य करते हैं। कुछ हिंदू परंपराओं में इस समय विवाह जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते।
हालांकि चातुर्मास के नियम और रीति-रिवाज हर जगह एक जैसे नहीं होते। अलग-अलग परिवारों और समुदायों में इनका पालन अपनी परंपरा के अनुसार किया जाता है।
इस तरह देवशयनी एकादशी केवल एक व्रत का दिन नहीं है, बल्कि यह भक्ति, संयम और धार्मिक आचरण से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अवसर भी है।

पंढरपुर और भगवान विठ्ठल का इतिहास
आज पंढरपुर का नाम सुनते ही चंद्रभागा नदी, विठ्ठल-रुक्मिणी का मंदिर और टाळ-मृदंग की आवाज के साथ चलते वारकरी याद आते हैं। लेकिन पंढरपुर का इतिहास कितना पुराना है और यह जगह इतनी प्रसिद्ध कैसे हुई?
पंढरपुर महाराष्ट्र का एक प्राचीन तीर्थस्थल है। इसके पुराने इतिहास को समझने के लिए ताम्रपत्रों, शिलालेखों और साहित्यिक रचनाओं का सहारा लिया जाता है।
ईस्वी सन 516 के एक ताम्रपत्र में ‘पांडुरंगपल्ली’ नाम का उल्लेख मिलता है। इसे पंढरपुर के पुराने इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संदर्भ माना जाता है। हालांकि केवल इस नाम के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि उस समय वहां आज जैसा विठ्ठल मंदिर भी मौजूद था।
बाद के समय के शिलालेखों में पंढरपुर और विठ्ठल देवता से जुड़े अधिक स्पष्ट उल्लेख मिलते हैं। ईस्वी सन 1237 के एक शिलालेख में होयसळ राजा सोमेश्वर की ओर से विठ्ठल की पूजा और भोग की व्यवस्था के लिए गांव दान दिए जाने का उल्लेख मिलता है।
इन ऐतिहासिक संदर्भों से पता चलता है कि मध्यकाल तक पंढरपुर विठ्ठलभक्ति का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका था। हालांकि मंदिर की स्थापना ठीक किस साल हुई, यह निश्चित रूप से बताना मुश्किल है।
समय के साथ संतों की रचनाओं, अभंगों, कीर्तन और वारकरी परंपरा के कारण पंढरपुर का महत्व और बढ़ता गया। धीरे-धीरे यह स्थान महाराष्ट्र के धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का एक खास हिस्सा बन गया।
पंढरपुर की वारी का इतिहास
आषाढ़ी एकादशी का नाम आते ही लाखों वारकरियों की पंढरपुर की ओर जाती हुई वारी याद आती है। लेकिन क्या यह परंपरा किसी एक संत ने शुरू की थी? इसका इतिहास थोड़ा अलग है।पंढरपुर जाने की तीर्थयात्रा संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम के समय से भी पहले से चली आ रही थी। पुराने साहित्यिक संदर्भों में भी पंढरपुर की यात्रा का उल्लेख मिलता है।
महाराष्ट्र के संतों ने इस परंपरा को लोगों के बीच लोकप्रिय बनाने में बहुत बड़ा योगदान दिया। संत ज्ञानेश्वर, संत नामदेव, संत एकनाथ और संत तुकाराम के अभंगों और रचनाओं में विठ्ठलभक्ति का सुंदर वर्णन मिलता है। इन संतों ने अपनी भाषा में आम लोगों तक भक्ति का संदेश पहुंचाया।
समय के साथ पंढरपुर की यात्रा केवल धार्मिक यात्रा नहीं रही, बल्कि यह वारकरी संप्रदाय की एक खास पहचान बन गई।
पालखी परंपरा के इतिहास में संत तुकाराम महाराज के पुत्र नारायण महाराज का नाम भी महत्वपूर्ण है। माना जाता है कि उन्होंने ईस्वी सन 1685 में संत तुकाराम महाराज की पादुकाओं को पालखी में लेकर पंढरपुर जाने की परंपरा को आगे बढ़ाया।
आगे चलकर संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम महाराज की पालखियां अलग-अलग मार्गों से पंढरपुर की ओर जाने लगीं। पालखी सोहळे का आयोजन समय के साथ अधिक व्यवस्थित होता गया। हैबतबाबा आरफळकर का नाम भी इस व्यवस्था को संगठित रूप देने के संदर्भ में लिया जाता है।
आज आळंदी से संत ज्ञानेश्वर महाराज की और देहू से संत तुकाराम महाराज की पालखी निकलती है। हजारों वारकरी उनके साथ पैदल चलते हुए पंढरपुर पहुंचते हैं। कई लोगों के लिए यह सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि पूरे साल इंतजार किया जाने वाला एक खास आध्यात्मिक अनुभव है।
वारी का अनुशासन और उसका पूरा प्रबंधन
पंढरपुर की वारी में हर साल लाखों लोग शामिल होते हैं। इतने सारे लोगों का एक साथ पैदल चलना, रास्ते में रुकना और समय पर पंढरपुर पहुंचना अपने आप में एक बड़ी व्यवस्था है।
वारी में हर दिंडी की अपनी एक अलग पहचान और परंपरा होती है। दिंडी में वारकरी एक तय क्रम से चलते हैं। कोई टाळ बजाता है, कोई मृदंग बजाता है, तो कोई अभंग गाते हुए आगे बढ़ता है। इन सबके बीच पूरी वारी का माहौल भक्तिमय बना रहता है।
कुछ दिंडियों में महिलाएं सिर पर तुलसी वृंदावन लेकर चलती हैं। कई वारकरी भगवा झंडा लेकर चलते हैं। हर दिंडी का अपना प्रमुख और अपनी व्यवस्था होती है।
पालखी सोहळे में चोपदारों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वे पालखी की व्यवस्था और दिंडियों के बीच तालमेल बनाए रखने में मदद करते हैं। उनकी पारंपरिक जिम्मेदारियों में जरूरी सूचनाएं देना और सोहळे की व्यवस्था संभालना शामिल है।
इतनी बड़ी यात्रा में रास्ते, ठहरने की जगह, भोजन, पानी और आराम का ध्यान रखना भी जरूरी होता है। रास्ते में आने वाले गांवों के लोग वारकरियों के लिए भोजन और पानी की व्यवस्था करते हैं। प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थाएं भी अपनी ओर से मदद करती हैं।
यही वजह है कि वारी केवल भक्ति का उत्सव नहीं, बल्कि लोगों के आपसी सहयोग और मिल-जुलकर काम करने का भी एक अच्छा उदाहरण है।

भाग 7: शासकीय महापूजा और 24 घंटे दर्शन
- सामान्य वारकरी का सम्मान: आषाढ़ी एकादशी की भोर में राज्य के मुख्यमंत्री विठ्ठल-रुक्मिणी की शासकीय महापूजा करते हैं। इस पूजा की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि दर्शन की कतार में खड़े लाखों श्रद्धालुओं में से किसी एक ‘सामान्य वारकरी दंपत्ति’ (पति-पत्नी) को इस महापूजा में बैठने का सौभाग्य मिलता है। यह लोकतंत्र में सच्चे भक्त का सबसे बड़ा सम्मान है।
- 24 घंटे खुला मंदिर: वारी के दिनों में लाखों भक्तों को सुगम दर्शन मिल सके, इसलिए विठ्ठल मंदिर लगातार कुछ दिनों तक 24 घंटे खुला रहता है।
- प्रक्षाळ पूजा: भगवान लगातार खड़े रहकर अपने भक्तों को आशीर्वाद देते हैं, जिससे उन्हें थकान (शिनवटा) महसूस होती है। इस थकान को दूर करने के लिए पूर्णिमा के आसपास विठ्ठल भगवान को आयुर्वेदिक औषधीय काढ़ों का लेप लगाया जाता है, जिसे ‘प्रक्षाळ पूजा’ कहा जाता है।

आषाढ़ी वारी का अनुभव कुछ अलग ही होता है…
आषाढ़ी एकादशी सिर्फ उपवास रखने या एक दिन पूजा करने का त्योहार नहीं है। यह महाराष्ट्र की भक्ति परंपरा और वारकरी संप्रदाय से गहराई से जुड़ा हुआ है।
पंढरपुर की ओर जाने वाली वारी में अलग-अलग गांवों और शहरों से लोग शामिल होते हैं। किसी के पास ज्यादा पैसा होता है, तो कोई साधारण परिवार से आता है। लेकिन भगवान विठ्ठल का नाम लेकर चलते समय सभी के मन में एक ही श्रद्धा होती है।
धूप हो या बारिश, रास्ता लंबा हो या पैरों में थकान, वारकरियों के मुंह से निकलने वाला ‘ज्ञानोबा माऊली, तुकाराम!’ का जयघोष उनका उत्साह बनाए रखता है।
वारी हमें केवल भक्ति ही नहीं सिखाती, बल्कि एक-दूसरे की मदद करना, मिल-जुलकर रहना और बिना किसी भेदभाव के साथ चलना भी सिखाती है।
हर साल लाखों लोग भगवान विठ्ठल के दर्शन के लिए पंढरपुर पहुंचते हैं। उनके लिए यह सिर्फ एक मंदिर की यात्रा नहीं, बल्कि मन को सुकून देने वाला और पूरे साल याद रहने वाला अनुभव है।
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संदर्भ :-
- 1. पद्मपुराण – एकादशी व्रत की पौराणिक कथा।
- 2. महाराष्ट्र राज्य गजेटियर – वारकरी संप्रदाय का इतिहास।
- 3. इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) – पंढरपुर के ऐतिहासिक शिलालेख।
- 4. सहपीडिया – पंढरपुर की वारी और मराठी संत परंपरा।
- 5. पंढरपुर मंदिर अधिनियम, 1973 – मंदिर की धार्मिक व्यवस्था।
