घर में दिवाली की चहल-पहल शुरू होते ही पकवानों से लेकर खरीदारी तक, कई तरह की तैयारियाँ शुरू हो जाती हैं। लेकिन जब लक्ष्मी पूजन का सही दिन तय करने की बारी आती है, तो घर में कोई न कोई तुरंत कह देता है, “ज़रा रुको, पहले पंचांग देख लेते हैं!”
गुड़ी पड़वा हो, गणेश चतुर्थी हो या फिर किसी व्रत-उपवास की तैयारी, पंचांग देखे बिना कई घरों में त्योहारों से जुड़ी चर्चा आगे ही नहीं बढ़ती।
अब ज़रा सोचिए। हमारे मोबाइल में तारीख दिखाई देती है, दीवार पर लगे कैलेंडर में भी हर दिन की तारीख होती है और हमें यह भी पता रहता है कि आज कौन-सा वार है। फिर इतनी सारी सुविधाएँ होने के बावजूद पंचांग की ज़रूरत क्यों पड़ती है? उसमें ऐसा क्या खास है कि त्योहारों की तारीख और पूजा का समय तय करने के लिए आज भी उसका सहारा लिया जाता है?
दरअसल, पंचांग केवल त्योहारों और व्रतों की तारीखों की सूची नहीं है। इसके पीछे सूर्य और चंद्रमा की आकाशीय स्थितियों से जुड़ी गणनाएँ हैं। जब हम इन गणनाओं को समझते हैं, तो पंचांग को देखने का हमारा नज़रिया ही बदल जाता है।
तो आइए, पंचांग की इस दिलचस्प दुनिया को थोड़ा करीब से समझते हैं।
विषय सूची
- पंचांग आखिर क्या है?
- तिथि क्या होती है? अंग्रेज़ी तारीख से यह कैसे अलग है?
- वार तो हम जानते हैं, फिर पंचांग में उनका क्या महत्व है?
- नक्षत्र क्या होते हैं? आकाश में चंद्रमा का सफर
- पंचांग का ‘योग’ क्या है? इसका योगासन से क्या संबंध है?
- करण क्या होता है? तिथि का आधा हिस्सा
- रोज़मर्रा की ज़िंदगी में पंचांग का उपयोग किसलिए होता है?
- एक ही त्योहार की तारीख अलग-अलग पंचांगों में क्यों दिखाई देती है?
- पंचांग के बारे में अधिक जानकारी के लिए विश्वसनीय संदर्भ
१. पंचांग आखिर क्या है?
‘पंचांग’ शब्द संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना है। ‘पंच’ यानी पाँच और ‘अंग’ यानी भाग। इस तरह पाँच अंगों से मिलकर बनी समय-गणना की पद्धति को पंचांग कहा जाता है।
इन पाँच अंगों में तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण शामिल हैं।
इन नामों से हममें से कई लोग परिचित होंगे। घर के बड़े-बुज़ुर्गों को रोज़ पंचांग देखते हुए भी देखा होगा। लेकिन इन पाँचों अंगों का सही अर्थ क्या है, यह हर किसी को पता हो, ऐसा ज़रूरी नहीं है।
पंचांग में इन पाँच अंगों के अलावा सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रोदय और चंद्रास्त जैसी खगोलीय घटनाओं के समय की जानकारी भी दी जाती है। भारत सरकार के भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) द्वारा प्रकाशित राष्ट्रीय पंचांग में भी इस तरह की जानकारी उपलब्ध है।
यानी पंचांग केवल यह नहीं बताता कि आज कौन-सी तिथि है या कौन-सा त्योहार पड़ रहा है। इससे दिन की खगोलीय स्थिति को समझने में भी मदद मिलती है।
अब इन पाँच अंगों में से सबसे अधिक चर्चा में रहने वाले पहले अंग यानी ‘तिथि’ को समझते हैं।
२. तिथि क्या होती है? अंग्रेज़ी तारीख से यह कैसे अलग है?
हम रोज़ कैलेंडर में तारीख देखते हैं। अगर आज १० तारीख है, तो कल ११ और उसके अगले दिन १२ तारीख होगी। अंग्रेज़ी कैलेंडर में तारीखों की यह गिनती एक निश्चित क्रम से चलती है।
लेकिन पंचांग की तिथि का हिसाब इससे थोड़ा अलग होता है।
तिथि निर्धारित करने के लिए सूर्य और चंद्रमा के बीच की कोणीय दूरी (Angular Distance) देखी जाती है। जब इस दूरी में हर १२ डिग्री का अंतर पूरा होता है, तब अगली तिथि शुरू हो जाती है।

यह सुनने में थोड़ा गणितीय लग सकता है, लेकिन चंद्रमा के बदलते आकार को ध्यान में रखें तो इसे समझना आसान हो जाता है।
अमावस्या के दिन चंद्रमा हमें लगभग दिखाई नहीं देता। इसके बाद धीरे-धीरे उसकी एक पतली-सी चमकदार रेखा दिखाई देने लगती है। अगले कुछ दिनों में यह हिस्सा बढ़ता जाता है और पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पूरा गोल दिखाई देता है। फिर धीरे-धीरे उसका प्रकाशित हिस्सा कम होने लगता है और अंत में अमावस्या आ जाती है।
चंद्रमा के इस पूरे चक्र में प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया जैसी तिथियाँ आती हैं।
अमावस्या से पूर्णिमा तक के समय को शुक्ल पक्ष और पूर्णिमा से अगली अमावस्या तक के समय को कृष्ण पक्ष कहा जाता है।
यहाँ एक ज़रूरी अंतर समझना चाहिए। अंग्रेज़ी कैलेंडर की तारीख आधी रात को बदलती है, जबकि पंचांग की तिथि सूर्य और चंद्रमा की आपसी कोणीय स्थिति के आधार पर बदलती है। इसलिए तिथि कभी भी शुरू या समाप्त हो सकती है।
उदाहरण के लिए, कोई तिथि आज दोपहर में शुरू होकर अगले दिन सुबह समाप्त हो सकती है। ऐसे में वह तिथि दो अंग्रेज़ी तारीखों में फैली रहती है। कई बार कोई तिथि सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाती है, इसलिए सूर्योदय के समय के आधार पर तैयार पंचांग में उस दिन उसका नाम दिखाई नहीं देता।
अब आप समझ सकते हैं कि दिवाली, गुड़ी पड़वा या गणेश चतुर्थी की तारीख हर साल एक जैसी क्यों नहीं होती। इन त्योहारों का संबंध विशेष तिथियों से होता है, इसलिए अंग्रेज़ी कैलेंडर में उनकी तारीख बदलती रहती है।
३. वार तो हम जानते हैं, फिर पंचांग में उनका क्या महत्व है?
रविवार आते ही छुट्टी का ख्याल आता है, सोमवार को कामकाज की शुरुआत होती है और शनिवार आते-आते सप्ताह के आखिरी दिन का एहसास होने लगता है। वार हमारे रोज़मर्रा के जीवन का इतना सामान्य हिस्सा हैं कि इनके बारे में अलग से सोचने की ज़रूरत ही महसूस नहीं होती।
फिर भी पंचांग में वार को एक महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है।
रविवार, सोमवार, मंगलवार, बुधवार, गुरुवार, शुक्रवार और शनिवार—ये सात वार हैं। तिथि के विपरीत, वार सूर्य और चंद्रमा के बीच की कोणीय दूरी से निर्धारित नहीं होता। यह सात दिनों के नियमित चक्र का हिस्सा है।
भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं में अलग-अलग वारों का संबंध कुछ विशेष देवी-देवताओं की पूजा से भी जोड़ा जाता है। उदाहरण के लिए, कई परिवारों में सोमवार को भगवान शिव की, गुरुवार को भगवान विष्णु या गुरु की और शनिवार को शनिदेव की पूजा करने की परंपरा है।
हालाँकि, ये मान्यताएँ और परंपराएँ हर प्रदेश और हर परिवार में एक जैसी हों, ऐसा ज़रूरी नहीं है।
हम जिस अंग्रेज़ी कैलेंडर का इस्तेमाल करते हैं, उसमें दिन की शुरुआत आधी रात से मानी जाती है। दूसरी ओर, भारतीय पंचांग की पारंपरिक दिन-गणना में सामान्यतः सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक के समय को एक दिन माना जाता है।
इसीलिए पंचांग में वार को समझते समय इस पारंपरिक दिन-गणना का ध्यान रखना ज़रूरी है।
४. नक्षत्र क्या होते हैं? आकाश में चंद्रमा का सफर
अगर किसी से उसका जन्म-नक्षत्र पूछा जाए, तो कई लोग तुरंत अश्विनी, रोहिणी, मृगशीर्ष, पुनर्वसु या चित्रा जैसे नाम बता देते हैं।
लेकिन ये नक्षत्र आखिर हैं क्या और इनका चंद्रमा से क्या संबंध है?
भारतीय खगोल परंपरा में चंद्रमा के आभासी मार्ग के आसपास स्थित राशिचक्र को २७ समान भागों में बाँटा गया है। इन भागों को नक्षत्र कहा जाता है। हर नक्षत्र का कोणीय विस्तार लगभग १३ अंश २० मिनट होता है।
चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है, इसलिए पृथ्वी से देखने पर आकाश में उसकी स्थिति लगातार बदलती हुई दिखाई देती है। इस दौरान वह इन २७ नक्षत्रों के अलग-अलग विभागों से होकर गुजरता हुआ दिखाई देता है।

उदाहरण के लिए, अगर किसी दिन पंचांग में रोहिणी नक्षत्र दिया गया है, तो इसका अर्थ है कि उस समय चंद्रमा की गणना रोहिणी नक्षत्र के विभाग में हो रही है।
यहाँ एक छोटी-सी गलतफहमी भी दूर कर लेते हैं। आकाश में दिखाई देने वाला हर तारा एक नक्षत्र नहीं होता। पंचांग में बताए गए नक्षत्र वास्तव में आकाश में चंद्रमा की स्थिति को समझने और मापने के लिए बनाए गए २७ विभाग हैं। इनका संबंध आकाश के तारामंडलों से ज़रूर है, लेकिन दोनों बिल्कुल एक ही चीज़ नहीं हैं।
नक्षत्रों की बात चली है, तो एक सवाल और मन में आता है। भारतीय महीनों के नाम चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ और आषाढ़ जैसे क्यों रखे गए हैं? क्या इनका भी नक्षत्रों से कोई संबंध है?
भारतीय महीनों के नामों के पीछे भी समय की गणना करने की एक पुरानी पद्धति है। अलग-अलग पारंपरिक काल-गणना प्रणालियों में महीनों के नाम निर्धारित करने के नियम अलग हो सकते हैं।
उदाहरण, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के राष्ट्रीय पंचांग में अमांत पद्धति का उपयोग किया जाता है। इस पद्धति में अमावस्या के बाद नया चंद्र मास शुरू होता है। जिस निरयन सौर महीने में संबंधित अमावस्या आती है, उसी के आधार पर चंद्र मास का नाम निर्धारित किया जाता है।
इस तरह भारतीय महीनों के नामों के पीछे भी खगोलीय गणनाओं की एक दिलचस्प परंपरा जुड़ी हुई है।
५. पंचांग का ‘योग’ क्या है? इसका योगासन से क्या संबंध है?
‘योग’ शब्द सुनते ही हमारे मन में योगासन, प्राणायाम और ध्यान का ख्याल आता है। लेकिन पंचांग में इस्तेमाल होने वाले योग का इनसे सीधा संबंध नहीं है।
पंचांग का योग सूर्य और चंद्रमा की आकाशीय स्थितियों पर आधारित होता है। इन दोनों के देशांतरों (Longitudes) को जोड़कर प्राप्त मान को १३ अंश २० मिनट के समान भागों में बाँटा जाता है। इस प्रकार कुल २७ योग होते हैं।
विष्कंभ, प्रीति, आयुष्मान, सौभाग्य और शोभन इनके कुछ नाम हैं।
पंचांग पढ़ते समय ये नाम थोड़े अपरिचित लग सकते हैं। इसकी वजह यह है कि रोज़मर्रा की भाषा में हम ‘योग’ शब्द का इस्तेमाल एक अलग अर्थ में करते हैं।
पारंपरिक ज्योतिष शास्त्र में इन योगों को विशेष शुभ या अशुभ अर्थ दिए गए हैं। कुछ धार्मिक कार्यों और अनुष्ठानों के लिए इनका विचार भी किया जाता है।
हालाँकि, किसी विशेष योग को शुभ या अशुभ मानने से किसी घटना पर निश्चित रूप से असर पड़ता है, इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है।
इसलिए यहाँ दो बातों को अलग-अलग समझना ज़रूरी है। सूर्य और चंद्रमा की स्थिति के आधार पर योग की गणना करना एक खगोलीय प्रक्रिया है, जबकि उस योग को परंपरा के अनुसार शुभ या अशुभ मानना धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यता का विषय है।
६. करण क्या होता है? तिथि का आधा हिस्सा
अब पंचांग के पाँचवें और आखिरी अंग यानी करण की बात करते हैं।
करण को समझने के लिए एक बार फिर तिथि के गणित पर लौटना होगा।
हमने देखा कि सूर्य और चंद्रमा के बीच की कोणीय दूरी में हर १२ डिग्री का अंतर पूरा होने पर अगली तिथि शुरू होती है। अब इन १२ डिग्री को दो बराबर हिस्सों में बाँट दें, तो हर हिस्सा ६ डिग्री का होगा।
तिथि के इस आधे हिस्से को ‘करण’ कहा जाता है।
यानी एक तिथि में दो करण होते हैं।
करण के कुल ११ नाम हैं। इनमें से बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि—ये सात करण एक निश्चित क्रम में बार-बार आते रहते हैं।
वहीं शकुनि, चतुष्पाद, नाग और किंस्तुघ्न—ये चार करण निश्चित क्रम में आते हैं और इन्हें स्थिर करण कहा जाता है।
पंचांग में इन नामों को पढ़ते समय शुरुआत में थोड़ी उलझन हो सकती है। लेकिन जब यह समझ आ जाता है कि करण वास्तव में तिथि का आधा हिस्सा है, तो इसका गणित भी आसान लगने लगता है।
एक तिथि के दौरान दो करणों के समय अलग-अलग होते हैं। इसलिए पंचांग में तिथि के साथ-साथ करण के शुरू और समाप्त होने का समय भी दिया जाता है।
७. रोज़मर्रा की ज़िंदगी में पंचांग का उपयोग किसलिए होता है?
अब तक हमने पंचांग के पाँचों अंगों को समझ लिया। लेकिन सवाल यह है कि इन सबका हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में क्या उपयोग होता है?
इसके लिए अपने घर में त्योहारों की तैयारियों का ही उदाहरण ले लीजिए।
गणेश चतुर्थी नज़दीक आते ही सबसे पहले यह तय किया जाता है कि गणपति की स्थापना किस दिन करनी है। दिवाली के समय लक्ष्मी पूजन की तारीख और शुभ समय देखा जाता है। रामनवमी और जन्माष्टमी जैसे त्योहारों के लिए भी संबंधित तिथि और धार्मिक नियमों को ध्यान में रखा जाता है।
ऐसे अवसरों पर पंचांग देखकर तिथि और पूजा के निर्धारित समय की जानकारी ली जाती है।
कई परिवारों में शादी, गृहप्रवेश, नए व्यवसाय की शुरुआत या अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के लिए भी पंचांग के अनुसार मुहूर्त देखने की परंपरा है।
इसके अलावा सूर्योदय, सूर्यास्त, चंद्रोदय और चंद्रास्त का समय जानने के लिए भी पंचांग उपयोगी है। ये समय हर स्थान पर एक जैसे नहीं होते। इसलिए पुणे और दिल्ली के पंचांग में सूर्योदय या सूर्यास्त का समय अलग-अलग हो सकता है।
लेकिन एक बात हमेशा ध्यान में रखनी चाहिए। पंचांग में सूर्य और चंद्रमा की स्थिति से जुड़ी गणनाओं का खगोलीय आधार होता है। दूसरी ओर, किसी विशेष मुहूर्त पर काम शुरू करने से वह निश्चित रूप से सफल होगा, इसकी कोई वैज्ञानिक गारंटी नहीं दी जा सकती। यह धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ी आस्था का विषय है।
८. एक ही त्योहार की तारीख अलग-अलग पंचांगों में क्यों दिखाई देती है?
ऐसा अनुभव कई लोगों को हुआ होगा।
आपने अपने मोबाइल में पंचांग का कोई ऐप खोला। उसमें किसी तिथि के समाप्त होने का समय सुबह १० बजे दिखाया गया। इसके बाद आपने दूसरा ऐप देखा, तो उसमें वही समय कुछ मिनट आगे या पीछे दिखाई दिया।
आखिर इनमें से सही कौन-सा है?
इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं।
पहला कारण है—गणना पद्धति।
पंचांग तैयार करते समय इस्तेमाल की जाने वाली खगोलीय गणनाओं और उनके आधार में अंतर हो सकता है। इसी वजह से अलग-अलग पंचांगों में कुछ समय का अंतर दिखाई दे सकता है।
दूसरा कारण है—स्थान और समय का संदर्भ।
तिथि, नक्षत्र और योग जैसी खगोलीय घटनाओं के समाप्त होने का समय सामान्यतः भारतीय मानक समय (IST) के अनुसार दिया जाता है। लेकिन सूर्योदय, सूर्यास्त और चंद्रोदय का समय हर शहर में अलग हो सकता है। इसलिए किसी त्योहार का निर्णय करते समय स्थानीय सूर्योदय और उससे जुड़े नियमों को भी ध्यान में रखा जाता है।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण है—त्योहार निर्धारित करने के पारंपरिक नियम।
हर त्योहार के लिए केवल तिथि का नाम देखना पर्याप्त नहीं होता। कुछ त्योहारों में सूर्योदय के समय मौजूद तिथि को महत्व दिया जाता है, तो कुछ में दिन के किसी विशेष समय पर मौजूद तिथि या अन्य धार्मिक नियमों को आधार बनाया जाता है।
इसी वजह से अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में एक ही त्योहार की तारीख अलग दिखाई दे सकती है।
इसलिए किसी त्योहार की तारीख तय करते समय केवल मोबाइल ऐप में दिखाई देने वाली एक तारीख पर निर्भर रहना उचित नहीं है। अपने क्षेत्र की परंपरा के अनुसार तैयार किए गए विश्वसनीय पंचांग और संबंधित त्योहार के नियमों को देखना अधिक सही होगा।
पंचांग के बारे में अधिक जानकारी के लिए विश्वसनीय संदर्भ
पंचांग की गणना और उसके पीछे छिपी खगोलीय जानकारी को और विस्तार से समझना चाहते हैं, तो भारत सरकार के भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के ये आधिकारिक संदर्भ उपयोगी हो सकते हैं।
१. राष्ट्रीय पंचांग का स्पष्टीकरण – भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD)
राष्ट्रीय पंचांग का स्पष्टीकरण पढ़ें
२. तिथि और नक्षत्र की जानकारी – भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD)
तिथि और नक्षत्र की जानकारी पढ़ें
अगली बार जब घर में कोई पंचांग खोलकर आज की तिथि पूछेगा, तो अब आपको केवल तिथि का नाम ही नहीं पता होगा, बल्कि यह भी समझ आएगा कि वह कैसे निर्धारित होती है और उसके पीछे कौन-सा गणित काम करता है।
दरअसल, हमारे पूर्वजों ने समय को समझने और उसकी गणना करने के लिए जो पद्धति विकसित की थी, वह केवल धार्मिक त्योहारों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे सूर्य और चंद्रमा की आकाशीय स्थितियों का लगातार निरीक्षण, गणितीय गणनाएँ और सदियों से विकसित होती आई खगोलीय परंपरा जुड़ी हुई है।
इसलिए पंचांग को समझना केवल अपनी संस्कृति को जानना नहीं, बल्कि आकाश में होने वाली खगोलीय गतिविधियों और समय की गणना करने की एक प्राचीन पद्धति से परिचित होना भी है।
