किसान और उसके बैल के बीच के अटूट रिश्ते और आभार (कृतज्ञता) को प्रकट करने वाला त्यौहार है ‘बेंदूर’ (Bendur Festival)। दिन-रात खेतों की लाल- काली मिट्टी में पसीना बहाने वाले अपने ‘सर्जा-राजा’ (बैलों) को आराम देकर उनका लाड़-प्यार करने का यह खास दिन होता है।
लेकिन यह त्यौहार आखिर कब शुरू हुआ? छत्रपति शिवाजी महाराज के काल में और पेशवाई के समय यह त्यौहार कैसा था? इसके अलावा, ‘महाराष्ट्र बेंदूर’ और ‘कर्नाटक बेंदूर’ नाम से दो अलग-अलग त्यौहार क्यों मनाए जाते हैं? इन सभी सवालों के विस्तृत और दिलचस्प उत्तर आज हम इस लेख में जानेंगे।
विषय सूची
बेंदूर त्यौहार का प्राचीन इतिहास और प्रमाण
बेंदूर त्यौहार की शुरुआत किसी एक दिन या किसी एक राजा द्वारा नहीं की गई थी। जब इंसान ने जंगलों में भटकना छोड़कर खेती करना शुरू किया, तब उसे बैलों के महत्त्व का एहसास हुआ और वहीं से इस त्यौहार का जन्म हुआ। इसके कई ऐतिहासिक प्रमाण आज भी मिलते हैं:
१. सिंधु घाटी सभ्यता (लगभग ५००० वर्ष पूर्व)
आज से लगभग ५००० साल पहले (यानी लगभग ३००० ईसा पूर्व) की ‘हड़प्पा और मोहनजोदड़ों’ सभ्यता के उत्खनन (खुदाई) में कूबड़ वाले बैलों (Zebu Bull) की कई मिट्टी की मुद्राएं (Seals) मिली हैं। इससे यह साबित होता है कि प्राचीन काल से ही भारतीय उपमहाद्वीप में बैल को अत्यंत पूजनीय और महत्त्वपूर्ण माना जाता रहा है।

२. कृषि पराशर ग्रंथ (४०० ईसा पूर्व से ४०० ईस्वी)
कृषि और मौसम के नियम बताने वाला ‘कृषि पराशर’ प्राचीन भारत का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण संस्कृत ग्रंथ है। यह ग्रंथ लगभग ईसा पूर्व ४०० से ईस्वी ४०० के कालखंड में लिखा गया था। इस ग्रंथ में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि: ‘खेतों में परिश्रम करने वाले पशुओं को विश्राम देना और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना हर किसान का परम कर्तव्य है।’ इसे इस त्यौहार के पीछे का सबसे बड़ा लिखित ऐतिहासिक प्रमाण माना जाता है।
शिवकाल, संत साहित्य और ब्रिटिश काल के दस्तावेज़
जैसे-जैसे समय बीतता गया, यह त्यौहार महाराष्ट्र और दक्षिण भारत की संस्कृति में गहराई से रच-बस गया। मध्यकालीन से लेकर आधुनिक काल तक इसके कई प्रमाण मिलते हैं:
१. संत साहित्य और लोक साहित्य (१३वीं से १७वीं शताब्दी)
महाराष्ट्र की महान संत परंपरा में भी बैलों की मेहनत की सराहना की गई है। संत ज्ञानेश्वर और संत तुकाराम महाराज के कई अभंगों (भक्ति पदों) में खेती, हल चलाने और बैलों के उदाहरण मिलते हैं। साथ ही, ग्रामीण इलाकों के लोकगीतों और जाँते पर गाए जाने वाले गीतों में बैल को ‘सर्जा-राजा’ कहकर सम्मानित किया गया है। यह मौखिक इतिहास इस पर्व की प्राचीनता को साबित करता है।
२. छत्रपति शिवाजी महाराज और मराठा साम्राज्य
छत्रपति शिवाजी महाराज के काल और पेशवा काल में महाराष्ट्र की संपूर्ण अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित थी। इस दौर में गाँवों के पाटिल, देशमुख और वतनदारों के ‘दफ़्तरों’ (लेखा-जोखा और हिसाब-किताब के कागजात) में बेंदूर और पोला त्यौहार के खर्चों के लिखित प्रमाण मिलते हैं। गाँव में जिसके पास सबसे सुंदर और बलिष्ठ बैल होते थे, उस बैल को त्यौहार के दिन ‘मानाचा बैल’ (सम्मानित बैल) के रूप में शोभायात्रा में सबसे आगे रखने की परंपरा इसी काल में विकसित हुई।

३. ब्रिटिश काल के दस्तावेज़ (Bombay Gazetteer)
अंग्रेज़ों के शासनकाल में उन्होंने भारत की परंपराओं और संस्कृति को दर्ज करने के लिए ‘बॉम्बे गज़ेटियर’ (Bombay Gazetteer) नामक आधिकारिक दस्तावेज़ तैयार किए थे।
इसके सातारा, कोल्हापुर और बेलगाम (बेलगावी) के खंडों में ब्रिटिश अधिकारियों ने ‘बेंदूर’ त्यौहार का विशेष उल्लेख किया है। एक बेज़ुबान जानवर की इस तरह पूजा करना, उसे सजाना और उसे पकवान खिलाना, अंग्रेज़ अधिकारियों के लिए बेहद आश्चर्य और कौतूहल का विषय था।
’महाराष्ट्र बेंदूर’ और ‘कर्नाटक बेंदूर’ – दो अलग त्यौहार क्यों?
यद्यपि त्यौहार की भावना और उद्देश्य एक ही है, फिर भी सीमावर्ती क्षेत्रों (कोल्हापुर, सांगली, बेलगाम) में इस त्यौहार की दो अलग-अलग तारीखें क्यों होती हैं? इसके ३ मुख्य कारण हैं:
- प्रकृति और मानसून का चक्र: कर्नाटक में मानसून (बारिश) महाराष्ट्र की तुलना में पहले पहुँचता है, इसलिए वहाँ खेती की शुरुआती तैयारी जल्दी पूरी हो जाती है। इसीलिए कर्नाटक में यह त्यौहार पहले, यानी ‘ज्येष्ठ पूर्णिमा’ (करा हुन्निमे) को मनाया जाता है।
- वहीं महाराष्ट्र में मानसून थोड़ा देर से स्थिर होता है, इसलिए यहाँ किसानों का काम आषाढ़ महीने तक चलता है। इसी वजह से महाराष्ट्र में यह त्यौहार एक महीने बाद ‘आषाढ़ पूर्णिमा’ को मनाया जाता है।
- पंचांग का अंतर: दोनों राज्यों में उपयोग किए जाने वाले हिंदू पंचांगों में थोड़ा अंतर होता है। (जैसे- महाराष्ट्र में ‘दाते पंचांग’, जबकि कर्नाटक में ‘उडुपी या मैसूर पंचांग’)। इसके अलावा सूर्योदय के समय में कुछ मिनटों का अंतर होने के कारण भी सीमावर्ती इलाकों में तिथि अलग दिन पड़ सकती है।
- भाषावार राज्य पुनर्गठन (१९५६): जब प्रशासनिक सुविधा के लिए महाराष्ट्र और कर्नाटक (मैसूर) नाम के दो अलग राज्य भाषाई आधार पर बने, तब सरकारी कैलेंडर और छुट्टियाँ अलग हो गईं। तारीखों के इसी अंतर के कारण सीमावर्ती क्षेत्र के लोगों ने इसे ‘महाराष्ट्र बेंदूर’ और ‘कर्नाटक बेंदूर’ का नाम दे दिया।
बेंदूर त्यौहार कैसे मनाया जाता है? (रीति-रिवाज़ और परंपराएँ)
बेंदूर त्यौहार मुख्य रूप से दक्षिण महाराष्ट्र और कर्नाटक में बड़े ही उत्साह के साथ मनाया जाता है:
- खांदे मळणी (कंधों की मालिश): त्यौहार से एक दिन पहले बैलों के कंधों पर हल्दी और गर्म तेल लगाकर मालिश की जाती है। साल भर हल खींचने से कंधों में होने वाले दर्द और अकड़न से उन्हें राहत मिलती है।
- स्नान और सजावट: बेंदूर के दिन सुबह बैलों को नदी या तालाब पर ले जाकर स्वच्छ स्नान कराया जाता है। उनके सींगों को रंगा जाता है, उन पर पीतल के आभूषण और ‘बाशिंग’ (सजावटी सेहरा) बाँधा जाता है। पीठ पर रंग-बिरंगी ‘झूल’ (सजावटी कपड़ा) उड़ाई जाती है।
- काम से पूरी छुट्टी: इस दिन ‘सर्जा-राजा’ से खेत का कोई काम नहीं लिया जाता। उन्हें पूरी तरह से आराम दिया जाता है।
- पूरनपोली का भोग: घरों में विशेष रूप से ‘पूरनपोली’ (मीठी रोटी) बनाई जाती है। पूजा-अर्चना के बाद सबसे पहला भोग बैलों को ही खिलाया जाता है।
- भव्य शोभायात्रा (मिरवणूक): शाम के समय पूरे गाँव में ढोल-नगाड़ों और गाजे-बाजे के साथ इन सजे-धजे बैलों की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है।

बेंदूर और बैल पोला (Bail Pola) में मुख्य अंतर
| विषय | बेंदूर (Bendur) | बैल पोला (Bail Pola) |
| कब मनाया जाता है? | आषाढ़ या ज्येष्ठ पूर्णिमा को | भाद्रपद/श्रावण अमावस्या को (पिठोरी अमावस्या) |
| कहाँ मनाया जाता है? | दक्षिण महाराष्ट्र (कोल्हापुर, सांगली, सातारा) और कर्नाटक | शेष महाराष्ट्र (विदर्भ, मराठवाड़ा, खानदेश) |
| मुख्य उद्देश्य | बैलों के प्रति कृतज्ञता और आभार व्यक्त करना | बैलों के प्रति कृतज्ञता और आभार व्यक्त करना |

बेंदूर केवल एक त्यौहार नहीं है, बल्कि यह मानव का प्रकृति और बेज़ुबान पशुओं के साथ गहरे प्रेम और आत्मीयता का प्रतीक है। ज़माना चाहे कितना भी बदल जाए, खेती में ट्रैक्टर जैसी आधुनिक मशीनें आ जाएँ, लेकिन खेतों की माटी में पसीना बहाने वाले बैलों के प्रति यह सम्मान और कृतज्ञता भारत की संस्कृति में हमेशा जीवंत रहेगी।
क्या आपने कभी सजे-धजे बैलों की शोभायात्रा (मिरवणूक) देखी है? क्या आपके गाँव या इलाके में भी बेंदूर या बैल पोला का त्यौहार मनाया जाता है?अपनी यादें, अनुभव या कोई भी सवाल नीचे कमेंट बॉक्स (Comment Section) में ज़रूर शेयर करें!
